
(शहरनामा)
जब शहर चल पड़ा माँ नर्मदा के साथ
शहर आमतौर पर
चलता नहीं—
दौड़ता है।
यहाँ कदम नहीं,
डेडलाइन होती है।
यहाँ सुबह अलार्म से होती है
और शाम थकान से।
लेकिन इस बार
नर्मदापुरम
कुछ अलग करने जा रहा है।
सेठानी घाट की सुबह
20 फरवरी की सुबह
कोई उद्घाटन मंच नहीं होगा,
कोई फीता नहीं कटेगा,
कोई डीजे शोर नहीं मचाएगा।
सुबह ठीक आठ बजे
सेठानी घाट
पर
शहर अपनी आवाज़ धीमी करेगा
और
भक्ति को बोलने देगा।
यह यात्रा
बैंड-बाजे से नहीं,
हरे राम के संकीर्तन से
शुरू होगी।
जब गुरु कहते हैं—चलो
इस मौन में,
एक स्वर होगा—
आचार्य पंडित सोमेश परसाई का।
गुरु ने कहा—
“नर्मदा परिक्रमा केवल
पैरों की यात्रा नहीं,
यह मन की परिक्रमा है।”
और शहर ने
पहली बार
गुरु की बात
मोबाइल में नहीं,
हृदय में रख ली।
सौ लोग, सौ मन—एक धारा
लगभग सौ लोग
अपने-अपने घरों से निकलेंगे।
कोई व्यापारी,
कोई कर्मचारी,
कोई युवा,
कोई वृद्ध।
सबकी चाल अलग,
पर दिशा एक—
माँ नर्मदा।
यह कोई टूर पैकेज नहीं,
जहाँ तस्वीरें ज़्यादा
और स्मरण कम हो।
यह यात्रा
हर दिन पूछेगी—
“आज तुम
कितना हल्के हुए?”
एक किताब, जो रास्ता बनती है
गुरु ने
यात्रियों को
एक किताब दी है।
इसमें
क्या साथ ले जाना है,
कैसे चलना है,
कब भजन,
कब संध्या वंदन—
सब लिखा है।
पर असल में
यह किताब
सामान नहीं,
संस्कार पैक कराती है।
पैदल, वाहन और श्रद्धा
शहर में चर्चा है—
“वाहन से परिक्रमा?”
गुरु मुस्कुराते हैं और कहते हैं—
“भगवान शंकर और पार्वती
मयूर पर बैठकर भी
परिक्रमा कर गए थे।”
नर्मदा का
हर कंकर शंकर है।
दोनों तटों पर
महादेव विराजते हैं।
यहाँ सवाल
कैसे चलने का नहीं,
कैसे झुकने का है।
ओंकारेश्वर की ओर
यात्रा
ओंकारेश्वर
की ओर बढ़ेगी।
लेकिन सच कहें तो
यह यात्रा
मंदिर तक नहीं,
मन तक जाएगी।
7 मार्च: भंडारा और मौन
7 मार्च को
भंडारा होगा—
पेट भरेगा।
पर जो सच में होगा,
वह यह कि
कई मन
भरे हुए
घर लौटेंगे।
शहरनामा का आख़िरी वाक्य
शहर अक्सर पूछता है—
“इससे मिलेगा क्या?”
इस परिक्रमा का उत्तर
बहुत सरल है—
जब शहर
कुछ दिनों के लिए
चलना सीख लेता है,
तब उसे याद आता है
कि वह
सिर्फ़ रहने की जगह नहीं,
एक साधना भी हो सकता है।
माँ नर्मदा के साथ
चल पड़ा यह शहर—
शायद
थोड़ा धीमा,
पर
पहली बार
सही दिशा …
दासानुदास चेदीराज दास
