
अठारह साल बाद भी मैं खुद को क्यों नहीं जान पाया…?
“युवा संवाद पुस्तिका” के एक स्वतंत्र अध्याय में प्रस्तुत
यह अध्याय युवाओं से सीधे संवाद करता है—
उपदेश नहीं देता,
दोष नहीं लगाता,
बल्कि कृष्ण–गीता के आलोक में आत्मचिंतन कराता है।
“अठारह साल बाद भी मैं खुद को क्यों नहीं जान पाया?”**
प्रिय युवा मित्र,
यह अध्याय तुम्हें सुधारने के लिए नहीं लिखा गया है।
यह तुम्हें समझने के लिए लिखा गया है।
अगर तुम अठारह–बीस साल के हो,
और यह सोचकर परेशान हो कि—
मुझे क्या करना है, यह साफ़ क्यों नहीं है?
सब कहते हैं “टैलेंट है”, पर दिशा क्यों नहीं मिल रही?
कोचिंग, प्रतियोगिता, तुलना—सबके बीच मैं कहाँ हूँ?
तो जान लो—
तुम अकेले नहीं हो।
1. एक असहज सवाल
तुम अठारह साल अपने घर में रहे।
माता–पिता के साथ,
शिक्षकों के साथ,
समाज के बीच।
फिर अचानक तुमसे कहा गया—
“अब बताओ, ज़िंदगी में क्या बनना है?”
यह सवाल कठिन इसलिए नहीं है
कि तुम कमजोर हो,
बल्कि इसलिए है कि—
तुम्हें खुद को जानने का अभ्यास कभी कराया ही नहीं गया।
2. कृष्ण और निर्णय की आज़ादी
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्धभूमि में
पूरा ज्ञान दिया,
पूरा सत्य बताया—
फिर कहा—
गीता 18.63
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु
सब कुछ सोच लो,
अब निर्णय तुम्हारा है।
ध्यान दो—
कृष्ण ने निर्णय थोपा नहीं।
आज के युवाओं की समस्या यह है कि
उनसे निर्णय तो माँगा जाता है,
पर निर्णय लेना सिखाया नहीं जाता।
3. कोचिंग क्यों भारी लगती है?
कोचिंग असफल इसलिए नहीं करती
कि वह कठिन है।
वह इसलिए भारी लगती है क्योंकि
तुम वहाँ अपने मन से नहीं,
डर से पहुँचे होते हो।
डर असफलता का
डर तुलना का
डर परिवार को निराश करने का
और डर में लिया गया कोई भी रास्ता
थोड़ा चलकर
थका देता है।
4. तुम हार नहीं मानते, तुम थक जाते हो
अगर कभी तुम्हारे मन में यह विचार आया हो—
“अब मुझसे नहीं होगा।”
तो जान लो—
यह हार नहीं,
थकान है।
गीता कहती है—
गीता 6.5
उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्
तुम खुद को उठा सकते हो,
पर पहले यह मानना होगा कि
तुम टूटे नहीं हो—
बस थके हो।
5. सफलता का दबाव और मन का मौन
आज तुमसे कहा जाता है—
जल्दी सफल बनो
जल्दी सेटल हो
पीछे मत रहो
लेकिन कोई यह नहीं पूछता—
तुम खुश हो या नहीं?
तुम डरते किससे हो?
तुम किसमें खुद को खो देते हो?
जब मन की बात
किसी से नहीं कही जाती,
तो मन खुद से भी बात करना छोड़ देता है।
यहीं से
भ्रम, नशा, अवसाद
चुपचाप प्रवेश करते हैं।
6. कृष्ण का एक सरल सूत्र
कृष्ण कहते हैं—
गीता 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन
तुम्हारा अधिकार है—
ईमानदारी से प्रयास करना
सीखना
खुद को बेहतर बनाना
फल—
तुरंत नहीं
दूसरों जैसा नहीं
और हर बार नहीं भी मिल सकता
लेकिन यह तुम्हारी कीमत तय नहीं करता।
7. खुद से एक ईमानदार बातचीत
इस अध्याय के बाद
खुद से तीन सवाल पूछो—
मुझे किस काम में समय का अहसास नहीं होता?
मैं किस डर की वजह से दूसरों की राह पकड़ रहा हूँ?
अगर तुलना न हो, तो मैं क्या चुनूँ?
यही प्रश्न
तुम्हारे लक्ष्य की पहली ईंट हैं।
8. कृष्ण को जीवन में लाने का अर्थ
कृष्ण को जीवन में लाने का अर्थ
केवल पूजा नहीं है।
इसका अर्थ है—
खुद से सच बोलने की हिम्मत
गिरकर भी खुद को गले लगाने की शक्ति
और यह भरोसा कि
मैं अकेला नहीं हूँ
गीता 9.22
योगक्षेमं वहाम्यहम्
जो मुझे याद करता है,
उसकी चिंता मैं करता हूँ।
अंतिम संवाद (युवा से युवा तक)
तुम्हें आज अपना पूरा रास्ता नहीं पता—
यह कोई अपराध नहीं है।
अपराध यह होगा
अगर तुम डर के कारण
किसी और का रास्ता जीने लगो।
धीरे चलो।
सवाल पूछो।
और याद रखो—
कृष्ण मार्ग दिखाते हैं,
रास्ता तुम खुद बनाते हो।
दासानुदास चेदीराज दास
