दिलीप मंडल ने बताया कि इस खेत पर 10 साल पहले केवल कंटीली झाड़ियां थीं। जमीन असमान थी और बारिश के मौसम में ही सीमित फसल आती थी। धीरे-धीरे नदी में रेत कम होने पर लोग तरबूज की खेती खेतों में करने लगे। उन्होंने भी अपनी जमीन को समतल कर निजी तालाब बनाकर तरबूज और रबी की फसल शुरू की। इस समय 5 एकड़ में तरबूज की खेती चल रही है जो 15 मार्च के बाद बाजार में बिकने लगेगी।
कुल निवेश करीब ढाई लाख रुपए है जिसमें बीज खाद और मेहनत शामिल हैं। प्रति एकड़ 10 से 25 टन तक फसल निकलती है और बाजार में कीमत 10 से 20 रुपए प्रति किलो मिलती है। इससे सालाना 3 से 6 लाख रुपए की आमदनी होती है और पिछले वर्ष शुद्ध मुनाफा 3.75 लाख रुपए रहा।
किसान ने खेती के लिए खास तकनीक अपनाई है। सबसे पहले बीजों को अंकुरित किया जाता है। फिर 2 गुणा 3 इंच के गड्ढों में तीन बीज और 200 ग्राम गोबर की खाद डालकर बुवाई की जाती है। पौधों में 3-4 पत्तियां आने के बाद सिंचाई शुरू होती है और खेत में नमी बनाए रखना जरूरी है। इसके अलावा फसल के बीच में जैविक और रासायनिक खाद का संतुलित उपयोग किया जाता है।
वर्तमान में 5 एकड़ में कलिया गोल्ड और करन वैरायटी के बीज लगाए गए हैं जिसकी कीमत 32 हजार रुपए प्रति किलो है। कुल मिलाकर 2 किलो बीज और ढाई लाख रुपए की लागत में किसान 3 से 6 लाख रुपए की कमाई कर रहा है।
दिलीप मंडल की यह सफलता इस बात का उदाहरण है कि उचित योजना सिंचाई प्रबंधन और सही तकनीक के जरिए बंजर जमीन को भी उपजाऊ बनाया जा सकता है। उनके प्रयास से न सिर्फ उनकी आमदनी बढ़ी है बल्कि आसपास के किसानों के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गए हैं।
