यह मामला पुलिस थाना साइबर एवं उच्च तकनीकी अपराध थाना भोपाल, जोन ग्वालियर से संबंधित है। अभियोजन के अनुसार, ग्वालियर निवासी आदित्य नारायण सक्सैना ने 27 अगस्त 2020 को साइबर थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। शिकायत में कहा गया था कि किसी अज्ञात व्यक्ति ने फोन कर स्वयं को मोतिलाल ओसवाल सिक्योरिटीज कंपनी का प्रतिनिधि बताया और डीमैट खाता खोलने का झांसा दिया। इस प्रक्रिया के नाम पर शिकायतकर्ता से 20 हजार रुपये एक एसबीआई बैंक खाते में जमा कराए गए।
पुलिस जांच के दौरान इस ठगी से जुड़े पांच लोगों को आरोपी बनाया गया, लेकिन अदालत में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष न तो आरोपियों की संलिप्तता के ठोस साक्ष्य प्रस्तुत कर सका और न ही कॉल डिटेल, बैंक ट्रांजैक्शन और तकनीकी साक्ष्यों को आपस में सही ढंग से जोड़ पाया। न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि केवल संदेह या अनुमान के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
कोर्ट ने जांच में एक और गंभीर पहलू की ओर ध्यान दिलाया। जिन मोबाइल नंबरों से फ्रॉड कॉल किए जाने का दावा किया गया था, उनमें से एक नंबर चंद्रभान यादव नामक व्यक्ति के नाम पर पंजीकृत पाया गया, लेकिन उसके विरुद्ध न तो कोई प्रभावी जांच की गई और न ही कोई कार्रवाई। न्यायालय ने इसे अत्यंत चिंताजनक बताया और कहा कि जब किसी मोबाइल नंबर का स्पष्ट पंजीकरण उपलब्ध है, तो उस दिशा में जांच न करना पुलिस की लापरवाही को दर्शाता है।
अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि जिन व्यक्तियों के विरुद्ध कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य नहीं थे, उन्हें आरोपी बनाकर पेश किया गया, जबकि वास्तविक तथ्यों और तकनीकी पहलुओं की गहराई से जांच नहीं की गई। इसी आधार पर सभी पांचों आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।फैसले के साथ ही विशेष न्यायाधीश ने विवेचक को कारण बताओ नोटिस जारी करने के आदेश दिए और साइबर सेल के पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर इस मामले में जांच की गुणवत्ता और जिम्मेदारी तय करने को कहा है। इस निर्णय को साइबर अपराधों की जांच में लापरवाही पर सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
