
भोपाल, 19 फरवरी 2026 (हिन्द संतरी ) आपातकाल का इतिहास यह सिखाता है कि यदि कोई तानाशाही थोपने का प्रयास करेगा तो भारतीय समाज उसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। समाज के रक्त में लोकतंत्र और जनतंत्र रचा-बसा है, उसे दबाने की कोशिश करने वाला अंततः मिट्टी में मिल जाएगा यह बात गुरूवार को सैम यूनिवर्सिटी हाल में पत्रकारों और युवाओं को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अखिल भारतीय कार्यकारिणी सदस्य सुरेश जोशी (भैयाजी जोशी) कही। गुरुवार को आपातकाल के 50 वर्ष पूर्ण होने पर ‘आपातकाल और युवा’ विषयक राष्ट्रीय विमर्श पर हिन्दुस्थान समाचार बहुभाषी संवाद समिति और सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी के संयुक्त तत्वावधान में एक आयोजन किया था जिसमें मध्यप्रदेश के उपमुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल, पूर्व राज्यसभा सदस्य कैलाश सोनी, स्वागत अध्यक्ष डॉ हरप्रीत सलूजा चेयरमैन सेम ग्रुप भोपाल तथा हिन्दुस्थान समाचार के अध्यक्ष अरविंद भालचंद्र मार्डीकर उपस्थित रहे।
“आपातकाल: देश का काला अध्याय”

भैयाजी जोशी ने कहा कि 26 जून 1975 से मार्च 1977 तक का कालखंड भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का काला अध्याय रहा। उन्होंने बताया कि उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निर्वाचन को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी। न्यायालय के निर्णय के बाद सत्ता छोड़ने के बजाय 25 जून 1975 की मध्यरात्रि को देश में आपातकाल लागू कर दिया गया। उन्होंने कहा कि ‘मीसा’ (MISA) जैसे कड़े कानूनों के माध्यम से विरोधियों को जेलों में डाल दिया गया, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगा दिया गया, प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई और जनसभाओं व आंदोलनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। यह सब एक व्यक्तिगत सत्ता की रक्षा के लिए किया गया कदम था। जोशी ने कहा कि 1977 में चुनाव की घोषणा हुई तो यह माना जा रहा था कि भय के वातावरण में जनता मुखर नहीं होगी, लेकिन समाज जागृत था। अवसर मिलते ही जनता ने मतदान के माध्यम से सत्ता को स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र सर्वोपरि है। उन्होंने कहा कि यह घटना दो बातें सिखाती है—पहली, भारत का समाज तानाशाही स्वीकार नहीं करेगा; और दूसरी, लोकतंत्र हमारी हजारों वर्षों की परंपरा का हिस्सा है।
भैयाजी जोशी ने कार्यक्रम के आयोजन के लिए हिन्दुस्थान समाचार का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि यहां शायद ही कुछ लोग होंगे, जिन्होंने उस आपातकाल का अनुभव किया है और बहुत से लोग हैं, जिन्होंने उस घटना के बारे में सुना है। जिन्होंने अनुभव किया, उनके लिए स्मृति से कई बातों को हटाना असंभव है। उन्होंने कहा कि देश का दुर्भाग्यपूर्ण काला इतिहास 26 जून 1975 को शुरू हुआ और मार्च 1977 को वह कालखंड समाप्त हुआ। क्या हुआ था उस समय, सत्ता में बैठी हुई व्यक्ति निरंकुश सत्ता चलाना चाहती थीं। हम कुछ भी करेंगे, उसके विरोध में कोई स्वर उठा न सके, हमें कोई रोक न सके, इस प्रकार का व्यक्ति केन्द्रित विचार करते हुए इस कानून का सहारा लेते हुए 25 जून की मध्य रात्रि को ये आपातकाल घोषित किया गया।
उन्होंने कहा कि सब प्रकार के जनतंत्र द्वारा प्राप्त अधिकारों का हनन करते हुए केवल और केवल एक व्यक्तिगत इच्छा की पूर्ति के लिए उसने यह सब कानून बनाया। उस समय के प्रधानमंत्री के निर्वाचन को इलाहाबाद हाई कोर्ट में चुनौती दी गई, उनके खिलाफ चुनाव लड़ने वाले राजनारायण थे। उन्होंने उस निर्णय को चुनौती दी। न्यायालय में मामला चला, फैसला आ गया कि निर्वाचन अनुचित है, लेकिन इंदिरा गांधी ने हटने का मार्ग चयन नहीं किया, सारे देश को जेल बनाने का निर्णय लिया। अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा को दांव पर लगाकर इस देश के लोकतंत्र को समाप्त करने का एक वेदनादायक कदम उठाया। जो कानून लाया गया, उसे मीसा के नाम से जाना जाता है।
भैयाजी जोशी ने कहा कि इस एक कानून के आधार पर अपने विरोधियों को सब प्रकार से प्रतिबंधित किया गया, जेल में डाला गया। इस कानून का भयानक सूत्र था कि इसके खिलाफ न्यायालय में भी नहीं जा सकते, इसके खिलाफ कुछ लिख नहीं सकते, जनसभाएं नहीं ले सकते, कोई आंदोलन खड़ा नहीं कर सकते। जो करेगा उसे देशद्रोही-समाजद्रोही माना जाएगा और उसे जेल के अंदर जाना पड़ेगा। इसके बाद 1977 में निर्वाचन घोषित कर दिया गया। चुनाव में 20-25 दिन बचे हैं। उन्हें लगा कि अलग-अलग दलों के जो नेता जेलों में हैं, उनकी आवाज दबी हुई है, वे क्या कर लेंगे। आश्चर्य की बात है कि सोया हुआ समाज नहीं था, जागृत समाज था। इसलिए जैसे ही अवसर प्राप्त हुआ समाज की शक्ति खुलकर सामने आ गई थी। उस डर के वातावरण में भी नेता बिना किसी भय के साहस के साथ जनता के बीच गए। नियोजित समय पर निर्वाचन हुआ और जनता ने उन्हें दिखा दिया कि तुम्हारा स्थान क्या है। इस देश का युवा वर्ग अपनी सूझ-बूझ के साथ खड़ा हुआ और काले कानून से मुक्त होते हुए मूल परम्पराओं के साथ चलना प्रारंभ किया। ये घटना दो बातें सिखाती हैं। एक बात है कि कोई तानाशाह बनने की कोशिश करेगा ये भारत यहां का समाज कभी भी इसका सहन करने वाला नहीं। दूसरी बात आती है समाज के रक्त में लोकतंत्र-जनतंत्र है, ये भारत की हजारों वर्षों की परम्परा है, यहां सभी को मत रखने का अधिकार है। इस अधिकार को जो भी समाप्त करने की कोशिश करेगा, वह मिट्टी में मिलेगा, यही उसकी नियति है।
“लोकतंत्र का अपहरण युवाओं को जानना चाहिए”: राजेन्द्र शुक्ल

उपमुख्यमंत्री राजेन्द्र शुक्ल ने कहा कि आपातकाल में जिस प्रकार लोकतंत्र का अपहरण हुआ, उसे जानना आज के युवाओं के लिए अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सत्ता जनता के आशीर्वाद से मिलती है और उसका दुरुपयोग भयावह परिणाम देता है। लाखों लोगों को जेलों में डालना और प्रेस की स्वतंत्रता समाप्त करना लोकतांत्रिक मूल्यों के विपरीत था। उन्होंने पंडित दीनदयाल उपाध्याय का उल्लेख करते हुए कहा कि राजनीति का उद्देश्य समाज के अंतिम व्यक्ति के जीवन में परिवर्तन लाना है। भारत आज विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है और युवाओं के लिए यह गर्व का विषय है। उन्होंने ‘विरासत से विकास’ की अवधारणा पर बल देते हुए कहा कि आर्थिक प्रगति के साथ सांस्कृतिक मूल्यों का संरक्षण भी आवश्यक है।
उप मुख्यमंत्री शुक्ल ने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने जब जनसंघ की पहली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की पहली बैठक की तो उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया था कि समाज के अंतिम छोर पर बैठा व्यक्ति जिस दिन मुस्कराकर कह दे कि अब किसी प्रकार की समस्या हमारे सामने नहीं। हमारी सारी समस्याओं का समाधान हो गया, उस दिन मान जाना कि आपका राजनीति में आने का उद्देश्य पूरा हो गया। देश का सौभाग्य है कि भारत आर्थिक महाशक्ति बन रहा है। चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हमारा देश बन चुका है। ये युवाओं के लिए संतोष की बात है, क्योंकि आगे उनका लम्बा भविष्य है, लेकिन आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ-साथ हमारी संस्कृति, हमारी विरासत और इसीलिए प्रधानमंत्री जी ने कहा है कि विरासत से विकास। हम अपना एक पैर जमीन में जमाकर और लम्बी छलांग लगाने की दिशा में देश को आगे ले जाने का काम होना चाहिए, जिससे विकास हमारे लिए अभिशाप न बने, बल्कि वरदान बने।
“इमरजेंसी की कल्पना से आज भी सिहरन”: कैलाश सोनी

पूर्व राज्यसभा सदस्य कैलाश सोनी ने 25 जून 1975 की रात को भारतीय लोकतंत्र का “काला अध्याय” बताया। उन्होंने कहा कि उस दौर को याद करते ही आज भी सिहरन पैदा हो जाती है, क्योंकि उन्होंने उसे स्वयं अनुभव किया है। सोनी ने कहा कि लोकतंत्र केवल चुनाव तक सीमित नहीं है, बल्कि यह नागरिक स्वतंत्रता, संवैधानिक मूल्यों और जनसहभागिता से जीवित रहता है। उन्होंने नई पीढ़ी से आह्वान किया कि वे लोकतंत्र के प्रहरी बनें और इतिहास की भूलों से सीख लेकर संविधान के मूल्यों की रक्षा करें। कार्यक्रम में सैम ग्रुप के चेयरमैन डॉ. हरप्रीत सलूजा ने स्वागत उद्बोधन दिया, जबकि आभार प्रदर्शन हिन्दुस्थान समाचार के क्षेत्रीय संपादक डॉ. मयंक चतुर्वेदी ने किया। संचालन डॉ. निवेदिता शर्मा ने किया। कार्यक्रम में सैम ग्लोबल यूनिवर्सिटी की कुलाधिपति प्रीति सलूजा सहित बड़ी संख्या में विद्यार्थी, प्राध्यापक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे।
