भोपाल। भोपाल के जेपी नगर स्थित यूनियन कार्बाइड (यूका) फैक्ट्री पर शनिवार को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने निरीक्षण किया और गैस राहत से जुड़े अधिकारियों के साथ विस्तृत चर्चा की। यह दौरा इसी बात का संकेत माना जा रहा है कि फैक्ट्री के 85 एकड़ जमीन के उपयोग को लेकर जल्द ही निर्णय लिया जा सकता है। शुक्रवार को जिला प्रशासन और गैस राहत विभाग की टीम जमीन से जुड़े फाइलों की जांच में जुटी रही, जबकि पुलिस विभाग ने डीआरपी लाइन के लिए भी जमीन मांगने का प्रस्ताव रखा है।
इस सबके बीच यह सवाल उभरकर सामने आया है कि उस जमीन का सही उपयोग क्या होगाक्या उसे विकास के कामों में लाया जाएगा या फिर गैस पीड़ितों की सुविधाओं के लिए सुरक्षित रखा जाएगा।
इस दौरान गैस पीड़ित संगठनों ने भी मुख्यमंत्री से मिलने की संभावना जताई। गैस पीड़ित संगठन ‘रचना ढिंगरा’ ने बताया कि वे 2-3 अहम मुद्दों पर चर्चा करना चाहते हैं। इनमें सबसे बड़ी मांग यह है कि कई महिलाओं को एक हजार रुपए प्रतिमाह पेंशन अभी तक नहीं मिल रही है। साथ ही गैस पीड़ितों के पुनर्वास और स्वास्थ्य संबंधी मामलों पर बनाई गई राज्य स्तरीय समिति की बैठक पिछले 11 साल से नहीं हुई है।
संगठन का कहना है कि इन मुद्दों पर तुरंत ध्यान दिया जाना चाहिए, क्योंकि पीड़ितों की हालत आज भी बेहद नाजुक है और उन्हें समय-समय पर सहायता की जरूरत रहती है।
यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के 40 साल बाद हटाए गए जहरीले कचरे की याद भी ताजा है। पिछले साल जनवरी में फैक्ट्री से 337 मीट्रिक टन जहरीला कचरा हटाया गया था। यह कचरा 12 कंटेनरों में उच्च सुरक्षा के बीच पीथमपुर ले जाया गया था, जहां लंबे विरोध प्रदर्शन के बाद इसे जलाया गया था।
हालांकि गैस पीड़ित संगठन अभी भी दावा करते हैं कि फैक्ट्री परिसर में हजारों टन कचरा दफन है, जिसके कारण आसपास के 42 बस्तियों का भूजल प्रदूषित हो चुका है। यह स्थिति आज भी लोगों की सेहत के लिए खतरा बनी हुई है और इसी कारण इलाके में पुनर्वास और पर्यावरण सुरक्षा की मांग लगातार उठती रहती है।
भोपाल गैस त्रासदी 2-3 दिसंबर 1984 की रात की घटना थी, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक त्रासदियों में गिना जाता है। उस रात यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के प्लांट CK में टैंक नंबर 610 से मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस लीक हुई, जिससे हजारों लोग प्रभावित और मारे गए।
उस रात की भयावहता का वर्णन आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैलाशों की संख्या इतनी अधिक थी कि उन्हें उठाने के लिए वाहन कम पड़ गए, और धुंध इतनी गहरी थी कि पहचानना भी मुश्किल हो गया।
याद रहे कि यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड ने 1969 में प्लांट स्थापित किया था। 1978 में अल्फा नेफ्थॉल और 1979 में MIC उत्पादन की यूनिट शुरू हुई थी। MIC अत्यंत खतरनाक रसायन था और अमेरिका में इसे कड़ी सुरक्षा के साथ एक-एक लीटर की बोतलों में भेजा जाता था, जबकि भारत में इसे बड़े स्टील कंटेनरों में लाया जाता था। 2 दिसंबर की रात टैंक की सफाई के दौरान पानी का रिसाव MIC टैंक में चला गया और ‘रन अवे रिएक्शन’ की वजह से टैंक फट गया, जिससे गैस फैली। इस त्रासदी में शुरुआती रिपोर्टों के अनुसार 3828 लोग तत्काल मारे गए, जबकि बाद में मौतों और प्रभावितों की संख्या कई गुना बढ़ती गई।
अब यह देखना होगा कि मुख्यमंत्री मोहन यादव की इस बैठक और निरीक्षण के बाद 85 एकड़ जमीन का उपयोग किस दिशा में होगाक्या यह जमीन पीड़ितों की सुविधा, पर्यावरण सुरक्षा और स्मृति स्थल के रूप में सुरक्षित रखी जाएगी या फिर विकास परियोजनाओं के लिए उपयोग की जाएगी। साथ ही गैस पीड़ितों की लंबित मांगों पर भी सरकार की क्या कार्रवाई होती है, यह अगले कुछ दिनों में स्पष्ट हो जाएगा।