जांच के दौरान गौशाला की स्थिति बेहद खराब मिली। फर्श टूटा हुआ पानी की टंकी लीकेज में और चरनौई भूमि पर चारे की बजाय गेहूं की फसल उगती हुई दिखी। सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि मृत गायों के शवों को दफनाने की बजाय वन विभाग की जमीन पर खुले में छोड़ दिया गया था। इससे प्रशासन की कार्रवाई तेज हो गई और कलेक्टर ने संबंधित इंजीनियरों और पशु चिकित्सा विभाग के अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करने के निर्देश दिए।
कलेक्टर ऋषव गुप्ता ने कहा कि धरमपुरी की गौशाला मुख्य मार्ग से लगभग 4 किलोमीटर दूर है। वहां पहले भी कुछ गायों के मृत और बचे हुए कंकाल मिलने की शिकायत आई थी। उस समय निरीक्षण के बाद गौशाला के संचालकों और ग्राम पंचायत के सरपंच-सचिव को बेहतर प्रबंधन के निर्देश दिए गए थे। साथ ही हर महीने गौशाला का दौरा करने वाले डॉक्टर को भी नोटिस जारी किया गया है।
गौशाला के संचालक जब कलेक्टर से पूछे गए तो नंद मोहन गौशाला के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर के सदस्य आशीष बरोले ने कहा कि आसपास के गांवों के लोग मृत गायों को यहां छोड़ जाते हैं हम क्या कर सकते हैं। इस बयान के बाद ग्रामीणों ने आरोपों को गलत बताया और कहा कि गायों की मौत गौशाला के खराब प्रबंधन और खाने-पीने की कमी से हुई है।
पशु चिकित्सा विभाग के उप-संचालक हेमंत शाह ने बताया कि गायों की मौत एक दिन में नहीं हुई बल्कि लगभग 15 दिनों के अंतराल में यह घटना सामने आई है। मौके पर सिर्फ एक गाय का शव मिला जबकि अन्य के कंकाल पाए गए जिन्हें सही तरीके से डिस्पोजल कराया गया। उन्होंने कहा कि पूरी जांच की रिपोर्ट कलेक्टर को दे दी गई है और दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी।मामले की जांच जिला प्रशासन द्वारा जारी है और अब इस गौशाला के प्रबंधन पानी-चारे की व्यवस्था और विभागीय लापरवाही की जाँच की जा रही है।
