जांच में चौंकाने वाले तथ्य
डिप्टी कलेक्टर की प्रारंभिक रिपोर्ट के अनुसार ₹93 लाख का सामान न स्टोर में है और न क्लीनिक तक पहुँचा, जबकि भंडार रजिस्टर में फर्जी एंट्री कर दी गई। कई क्लीनिकों में अलमारियां गायब हैं, लेकिन उनके लिए भुगतान हो चुका है। कुछ सेंटरों पर जांच शुरू होने से तीन दिन पहले प्रिंटर भिजवाए गए, जबकि वहां कंप्यूटर तक नहीं थे।
फर्जीवाड़ा 5 पॉइंट में:
फर्जी बिलिंग: 13 फर्जी बिलों के जरिए ₹1.75 करोड़ का भुगतान हुआ, जबकि सामान कभी केंद्रों तक नहीं पहुंचा।
कागजी मरम्मत: पुताई और मेंटेनेंस के लिए लाखों खर्च किए गए, लेकिन दीवारों पर सालों से चूना तक नहीं लगा।
गायब उपकरण: बीपी मशीन, ग्लूकोज मशीन, हीमोग्लोबिनोमीटर और वेट मशीन केवल कागजों में खरीदी गई।
जांच का डर: डिप्टी कलेक्टर की टीम की जांच शुरू होने पर अफसरों ने आनन-फानन में सेंटरों पर प्रिंटर भेजे।
निजी उपकरण से इलाज: डॉक्टरों को अपने पर्सनल टैबलेट और मशीन से मरीजों की जांच करनी पड़ रही है।
डॉक्टरों का दर्द:
गोरैया घाट क्लीनिक की डॉ. सौम्या अग्रवाल ने बताया कि वे 2 साल से अपनी ड्यूटी कर रही हैं, लेकिन कंप्यूटर या जरूरी उपकरण नहीं मिले। उन्होंने अपनी पर्सनल टैबलेट से मरीजों की एंट्री की। बीपी मशीन और अन्य उपकरण 4-5 महीनों से मांगने के बावजूद अब भेजे जा रहे हैं।
केंद्रों की स्थिति:
जबलपुर में करीब 50 संजीवनी क्लीनिक हैं, लेकिन अधिकतर में बुनियादी उपकरण तक मौजूद नहीं हैं। भुगतान केवल कागजों में हुआ। जांच शुरू होने के बाद केवल प्रिंटर भेजे गए।
घोटाले का अनुमान:
डिप्टी कलेक्टर के अनुसार, अभी तक 93 लाख रुपये का फर्जी भुगतान प्रमाणित हो चुका है। सूत्रों के अनुसार, 2021 से अब तक की पूरी जांच के बाद यह घोटाला 10 करोड़ तक पहुंच सकता है। साथ ही ज्वाइंट डायरेक्टर हेल्थ डॉ. संजय मिश्रा की निजी पैथोलॉजी लैब में हिस्सेदारी और आय से अधिक संपत्ति भी जांच के दायरे में है।
अधिकारियों पर कार्रवाई:
मुख्य आरोपी डॉ. संजय मिश्रा को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है। इसके अलावा डीपीएमयू के अधिकारियों को हटाया गया, एक फार्मासिस्ट निलंबित और संविदा फार्मासिस्ट के खिलाफ कार्रवाई की गई।
