उमरिया । मध्य प्रदेश के उमरिया जिले स्थित बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला कबीर मेला इस वर्ष भी अपनी भव्यता और धार्मिक महत्व के साथ संपन्न हुआ। हर साल अगहन पूर्णिमा पर आयोजित होने वाला यह मेला न केवल कबीरपंथी श्रद्धालुओं का आकर्षण केंद्र होता है बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक समृद्धि का भी प्रतीक बनता है। इस वर्ष मेले में 5000 से ज्यादा दर्शनार्थी पहुंचे जिनमें मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों से श्रद्धालु शामिल थे।
कबीर मेला श्रद्धा और आस्था का संगम
कबीर मेला जो बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में स्थित कबीर गुफा और कबीर चबूतरे के दर्शन के लिए आयोजित होता है, इस वर्ष भी श्रद्धा संस्कृति और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ मनाया गया। कबीर गुफा और चबूतरा उन स्थलों में शामिल हैं जहां पर प्रसिद्ध संत कबीर दास ने ध्यान और साधना की थी। इस मेला में देशभर से श्रद्धालु पैदल यात्रा करके इन स्थलों तक पहुंचते हैं और कबीर के दर्शन प्राप्त करते हैं। इस बार करीब 20,000 लोग ताला क्षेत्र में पहुंचे, जिनमें से लगभग 5000 दर्शनार्थियों ने पैदल यात्रा कर बांधवगढ़ तक पहुंचने का साहसिक कदम उठाया। ताला से बांधवगढ़ तक का 15 किलोमीटर का यह रास्ता श्रद्धालुओं ने सुबह साढ़े सात बजे से शुरू किया और पूरे दिन पैदल चलते हुए शाम तक कबीर चौरा और कबीर गुफा तक पहुंचे।
पर्यावरण संरक्षण का संदेश
कबीर मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं बल्कि पर्यावरण संरक्षण के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है। बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व जो भारतीय वन्यजीवों का एक महत्वपूर्ण घर है इस मेले के माध्यम से पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण का संदेश भी फैलाता है। इस वर्ष के आयोजन में पार्क प्रबंधन ने भी मेले की सभी तैयारियां समय से पूरी की थी ताकि किसी भी प्रकार की प्राकृतिक आपत्ति का सामना न करना पड़े। मेले के दौरान पर्यटन से जुड़ी व्यवस्थाएं मजबूत थीं और श्रद्धालुओं को सुरक्षित और आरामदायक अनुभव प्रदान किया गया।
सांस्कृतिक समृद्धि का उत्सव
कबीर मेला भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का भी प्रतीक है। कबीर दास, जो एक महान संत और कवि थे ने समाज में व्याप्त कुरीतियों के खिलाफ अपने भक्ति और सूफी मत के द्वारा आम जनमानस को जागरूक किया था। उनका संदेश आज भी समाज में प्रासंगिक है और इस मेले के माध्यम से उनकी शिक्षाएं जन-जन तक पहुंच रही हैं। इस मेले के आयोजन से सांस्कृतिक एकता और भाईचारे की भावना को भी बढ़ावा मिलता है। विभिन्न प्रदेशों से आए श्रद्धालु एक साथ मिलकर कबीर के दर्शन करते हैं और उनकी शिक्षाओं का अनुसरण करने का संकल्प लेते हैं।
स्थानीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
कबीर मेला स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमंद साबित होता है। मेले के दौरान ताला और बांधवगढ़ जैसे क्षेत्रों में श्रद्धालुओं और पर्यटकों का भारी आना-जाना होता है, जिससे स्थानीय दुकानदारों, होटल मालिकों और परिवहन सेवाओं को लाभ होता है। इस प्रकार मेला न केवल धार्मिक महत्व रखता है बल्कि स्थानीय लोगों के लिए आर्थिक अवसर भी प्रदान करता है। कबीर मेला बांधवगढ़ एक ऐसा धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन है जो न केवल श्रद्धा और आस्था का प्रतीक है बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक समृद्धि का भी संदेश देता है। इस मेले के माध्यम से कबीर दास के अमूल्य योगदान को जन-जन तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है। इस प्रकार कबीर मेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि भारतीय समाज की सांस्कृतिक धरोहर एकता और पर्यावरण संरक्षण की एक महान मिसाल बन गया है।
