बालाघाट । मध्य प्रदेश का बालाघाट जिला जो कभी माओवादी गतिविधियों का केंद्र हुआ करता थ अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। यहां के जंगलों में माओवादी नेताओं का दबदबा था लेकिन सुरक्षा बलों के लगातार दबाव सघन सर्चिंग और मुठभेड़ों के कारण माओवादियों की स्थिति अब काफी कमजोर हो चुकी है। बालाघाट में माओवादियों के आंतरिक संघर्ष सुरक्षा बलों से भागने के लिए लगातार ठिकाने बदलने और जरूरी संसाधनों की कमी ने उनके अस्तित्व को खतरे में डाल दिया है। माओवादी संगीता का आत्मसमर्पण जो हाल ही में गोंदिया में पुलिस के सामने सामने आई इस बदलते माहौल का एक उदाहरण है। संगीता ने बताया कि सुरक्षा बलों से बचने के लिए माओवादी एक दिन में 15 से 20 किमी तक पैदल चलकर बार-बार ठिकाने बदल रहे हैं। उनके पास अब राशन दवाइयां और अन्य आवश्यक संसाधन समाप्त हो चुके हैं जो उनकी कठिनाइयों को और बढ़ा रहे हैं।
संगीता जो एक चिकित्सक के रूप में माओवादी दलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही थी घायल साथियों का उपचार करती थी और उसे दवाओं की भी गहरी जानकारी थी। बावजूद इसके उसे आत्मसमर्पण करने के कई प्रयासों में सफलता नहीं मिल पाई लेकिन अंतत सुरक्षा बलों के दबाव के कारण उसने हथियार डाल दिए। बालाघाट में माओवादी गतिविधियों की स्थिति की बात करें तो 2016-17 के दौरान यहां 200-250 माओवादी सक्रिय थे। लेकिन अब तीन साल में 20 से ज्यादा माओवादी ढेर हो चुके हैं और कई माओवादी दल समाप्त हो चुके हैं। कान्हा भोरमदेव दलम टाडा दलम और परसवाड़ा दलम अब इतिहास बन चुके हैं। दर्रेकसा दलम भी आत्मसमर्पण की प्रक्रिया से लगभग समाप्त हो चुका है। अब सिर्फ मलाजखंड दलम सक्रिय है जिसमें 23 माओवादी बालाघाट के जंगलों में गुपचुप तरीके से अपनी गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं।
बालाघाट में माओवादी नेताओं की स्थिति भी बहुत कमजोर हो चुकी है। माओवादी संपत जो अब बुजुर्ग हो चुके हैं और दीपक जो आत्मसमर्पण करने का इच्छुक है इसकी पुष्टि करते हैं कि माओवादी अब आत्मसमर्पण या मौत के बीच किसी एक विकल्प का सामना कर रहे हैं। इसके अलावा माओवादी सीसीएम सदस्य रामधेर के पास भी अब केवल गिने-चुने सहयोगी बचें हैं और उनकी गतिविधियां छत्तीसगढ़ और बालाघाट के बीच के जंगलों में सिमट कर रह गई हैं। हालात ये हैं कि अब बालाघाट में माओवादी क़रीब-क़रीब खत्म हो चुके हैं और उनकी स्थिति सुरक्षा बलों के दबाव में और भी कमजोर होती जा रही है। इन परिस्थितियों में माओवादी अब अपनी जीवन रक्षक कार्रवाई के लिए आत्मसमर्पण करने की ओर बढ़ रहे हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि मध्य प्रदेश के माओवादियों के खिलाफ की गई सख्त कार्रवाइयों के परिणाम अब दिखाई देने लगे हैं।
