चित्र सभी हितेश थुद्गल
(आत्माराम यादव प्रधान संपादक हिन्द संतरी)
शिवराज सिंह चौहान की तत्कालीन प्रदेश सरकार ने नर्मदा नदी को एक जीवित एकाई मानकर सम्पूर्ण प्रदेश में जागरूकता लाने के लिए 2 जुलाई 2011 को प्रदूषण बोर्ड की रिपोर्ट को आधार बनाकर नर्मदा के सपूत पूर्व केंद्रीय मंत्री एवं पर्यावरणविद अनिल माधव दबे कि पहल पर नर्मदा जल को स्वच्छ बनाने के लिए मुख्यमंत्री श्रीचौहान ने 1618 करोड़ रुपए की नमामि देवी नर्मदे योजना की शुरुआत 11 दिसंबर 2016 को करते हुये नर्मदा के किनारे के शहरों में 1077 किलोमीटर सहित कुल 2930 किलोमीटर की यात्रा 148 दिनो में पूरी कर इसे सांस्कृतिक ओर धार्मिक यात्रा का रूप दिया किन्तु यह दुर्भाग्य रहा की 148 दिन की यात्रा पूरी होते ही 9 दिन बाद 17 मई 2017 को श्री अनिल माधव दवे जी का निधन हो गया, जिसमें उनका संरक्षण ओर निगरानी के अभाव में मध्यप्रदेश की लाइफलाइन कही जाने वाली नर्मदा नदी को निर्मल बनाने हेतु इस वृहद योजना में 1618 करोड़ का बजट जिसमें 873 करोड़ राज्य सरकार के तथा शेष राशि एशियन डेवलपमेंट बैंक, वर्ल्ड बैंक और जर्मन बैंक केएफडब्ल्यू से कर्ज लिया गया लेकिन इस कर्ज की राशि से नर्मदा किनारे बसे 10 शहरों में सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट बनाकर गंदा पानी मिलने से रोकने के प्रयास के चिन्ह दिखाई नहीं देए अलबत्ता कुछ जगह नए एसटीपी भी बनाए गए। इस नमामि देवी नर्मदे योजना हेतु निकली यात्रा के प्रचार प्रसार हेतु तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अभिनेता विवेक ओबेरॉय, अनुपम खेर, गोविंदा, और सुजैन बर्नर्ट, आध्यात्मिक गुरु सद्गुरु जग्गी वासुदेव, दलाई लामा, शास्त्रीय संगीतकार सोनल मानसिंह, और विश्व मोहन भट्ट जैसे कई लोग शामिल को साथ रखकर वाहवाही लूटी किन्तु आज 8 साल बाद भी नर्मदा स्वच्छ नहीं हो सकी, उल्टे उसके अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है।
1618 करोड़ रुपए मामूली रकम नहीं है किन्तु नमामि देवी नर्मदे योजना का की इस राशि से नर्मदा नदी को स्वच्छ बनाने के लिए लोगों में जागरूकता बढ़ाना और उनका समर्थन हासिल करने में क्या यह सरकार सफल रही थी, यह यक्ष प्रश्न इसलिए भी प्रासंगिक है क्योकि इस योजना के तहत, जैविक खेती, मिट्टी के संरक्षण, पानी के संरक्षण, वनीकरण, और प्रदूषण को कम करने जैसे कामों की रिपोर्ट सामने नहीं आ सकी कि उल्टे जनता ने खुद अपनी आंखो से देखा की इस राशि का विशाल आयोजन, यात्रा खर्च एवं बुलाये गए अतिथियों पर हुआ जिसमें जहां नर्मदा को सम्मान देने की बजाय जगह जगह खुद का सम्मान कराकर योजना का गुणगान किया गया था, किन्तु आज इस सरकार के वे 1618 करोड़ किस स्थान पर किस तरह खर्च किए गए, किसी भी जिले में उसके प्रमाण ढूंडे नहीं मिलेंगे। आज वही नर्मदा अपने अस्तित्व को लेकर बैचेन है उसके सम्मान में नमामि नर्मदे मध्यभारत की प्रसिद्ध नदी नर्मदा जिसका पौराणिक महत्व रामायण ओर महाभारत में अनेक बार किया गया है वह पुण्यदायिनी अमरकंटक पर्वत से निस्सृत होकर भृगुकच्छ भाड़ोच के पास खंभात की काढ़ी में गिरती है, का रास्ते का तो पता नहीं किन्तु यहाँ नर्मदापुर संभाग ओर सीहोर जिले में चल रहे करखानों, मिलों ओर फेक्टरियों द्वारा का; जल को प्रदूषित करने सा साथ ही रेतचोरों के कारण नर्मदा नदी संकट में है ओर बुरे हाल में होने से नर्मदा के अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। खुद को नर्मदा मैया का बेटा कहकर नर्मदा के जल को प्रदेश के विभिन्न संभागों जिलों में लेजाकर जल का कारोबार कर सरकार की तिजोरी भरने वाले पूर्व मुख्यमंत्री ओर वर्तमान केंद्रीय सरकार के कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान सभाओ में ओर नर्मदा मंच से नर्मदे हर, नर्मदामैया की जय बोलकर भले भोले भाले नादानों से वाहवाही लूटने में सफल रहे किन्तु उनके द्वारा खोली गई फेक्टरिया- कारखाने चौबीसों घंटे नर्मदा जल अशुद्ध कर नर्मदा के अस्तित्व के लिए संकट पैदा कर नर्मदा को गहन पीडा पहुचाने का जश्न मनाते रहे है।
शिवराज सिंह चौहान ने अपने मुख्यमंत्री रहने के दरम्यान बुदनी में वर्धमान एवं अभिषेक फेक्ट्री तथा बाबई में कोकाकोला जैसे बडे कारखाने खुलवाकर उन्हे नर्मदा से असीममित जल की सुविधा देकर नर्मदा जल का दुरूपयोग की सुविधा देकर इन कारखानों से निकलने वाले प्रदूषित जल को सीधे नर्मदा में मिलने से नहीं रोक सके है। इतना ही नहीं नर्मदापुरम नगर का निस्तारी का नाला शहरवासियों की समूची गंदगी लेकर खुलेआम नर्मदा में मिलने से नर्मदा का जल पर्यावरण घाट से दूषित हो रहा है जो आगे सेठानी घाट से होकर निकलने पर मजबूरन इसी गंदे नाले के मिश्रित जल से स्नानार्थीओ को स्नान करने की विवशता से सभी की भावनाओं को आहत किया जा रहा है। राज्य के 16 ज़िले ऐसे हैं जिनके गंदे नालों का प्रदूषित पानी नर्मदा में प्रदूषण के स्तर को बढ़ा रहा है ओर वहाँ की नगरपालिकाओं और नगर निगमों द्वारा गंदे नालों के ज़रिए दूषित जल नर्मदा में बहाने पर सरकार रोक नहीं लगा पाई है और न ही आज तक नगरीय संस्थाओं के लिए दूषित जल के निकासी की कोई योजना बना पाई है। इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्र के कटाव से भी नर्मदा में प्रदूषण बढ़ रहा है। नर्मदा नदी 16 जिलों की सीमाओं के भीतर से होकर निकलती है जिसमें मध्यप्रदेश के इन जिलों से निकलने वाले 150 से अधिक नालों का गंदा पानी और ठोस मल पदार्थ रोज़ नर्मदा जल में बहाया जाता है, जिससे अनेक स्थानों पर नर्मदाजल खतरनाक रूप से प्रदूषित हो रही है ओर सबसे अधिक नाले नर्मदापुरम में 32 बताए गए है जो खतरनाक रूप ले कर नर्मदा की पवित्रता समाप्त करने पर आमादा है।
नर्मदा नदी में सीधे मिलने वाले नालों के इन्टरसेप्शन एवं डायवर्सन के लिये बनाई गई योजना के अनुसार पम्प एवं सम्प वैल की स्थापना कर डायवर्सन की कार्यवाही तो प्रारम्भ कर दी गई है परन्तु डायवर्सन के उपरांत सीवेज के ट्रीटमेंट के लिये बनाई गई योजना की वित्तीय स्वीकृति हेतु प्रस्ताव नगरीय प्रशासन एवं विकास विभाग को भेजा गया है, जिसकी स्वीकृति अपेक्षित है । नर्मदा प्रदूषण उपशमन समिति द्वारा किये गये निरीक्षण/सर्वेक्षण में प्रदूषण की स्थिति नर्मदापुरम के घाटों पर पाई गई है जिसमें कोरी घाट पर मिलने वाले नाले के डायवर्सन के लिये बनाये गये सम्प एवं पम्प हाउस को बन्द रखा गया है ओर सीवेज के नालों से प्रदूषण नियंत्रण के लिये इस योजना को पुनरीक्षित कर वर्तमान की सभी पर्यावरणीय समस्याओं को इसमें शामिल किया किन्तु कार्य शुरू नही हो सके। प्रदेश सरकार के आंकड़े देखे जाए तो नर्मदापुरम जिले में 32 नाले हैं, मंडला जिले में 16, जबलपुर ज़िले में 22 बड़े नाले, खंडवा जिले में 18 बड़वानी जिले में 11, अनूपपुर जिले में 9, खरगौन जिले में-10, डिंडौरी में 9 और रायसेन ज़िले में 7 नाले, हरदा जिले में 8, सीहोर जिले में 7 नाले ओर देवास जिले में 12 बड़े नाले है जो गंदे पानी और ठोस मल पदार्थों से प्रदूषित करते है वही अनेक स्थानों पर नर्मदातटीय खेतिहर भूमि से रासायनिक खाद और कीटनाशकों का पानी भी नर्मदा में बहाया जाता है। नर्मदा का कछार अब पहले जैसे वनक्षेत्र नहीं रह गया अब वहाँ भी कृषि होने से हर जगह कृषि क्षेत्र में लगातार वृद्धि हो रही है। लाभकारी खेती के लिए किसान कई प्रकार के रासायनिक खाद और कीटनाशकों का उपयोग करते हैं। एक फसल के दौरान पांच से सात बार सिचाई भी होती है। इसके बाद भी खाद और कीटनाशकों के घातक रसायन खेत की मिट्टी में घुलमिल जाते हैं जो वर्षाकाल में पानी के साथ बहकर नर्मदा नदी में मिलते हैं और इससे प्रदूषण का स्तर बढ़ रहा है। वनक्षेत्रों में कमी के कारण मिट्टी और मुलायम चट्टानों में कटाव से भी नदी में जमाव बढ़ रहा है और प्रदूषण फैल रहा है।
शहरी गंदे नालों, फेक्टरियों के केमिकल प्रदूषित जल ओर किसानों के कीटनाशक घातक रसायनों की खेत की मिट्टी से नर्मदा में मिलने वाले जल से नर्मदा नदी खुद बीमार हो जाती है,परिणामस्वरूप हर तीन-चार साल बाद नर्मदा को अजीब बीमारी लग जाती है जिसे आज़ोला घास का प्रकोप कहा गया है। पिछले एक दशक से नर्मदा को गंभीर रोग हर साल लगता है जिसमें जहॉ उसका जलस्तर तेजी से गिरता है वहीं अजोला नाम की घास नर्मदा के जल में फैल जाती है जिससे लोगों को स्ना्न और आचमन में परेशानी होती है, वहीं कई लोग इससे आने वाले भावी खतरों के भय से स्ना्न नहीं करते, तो कईयों का कहना रहता है कि अजोला के रहते स्नान करने से लोगों की त्वचा में जलन, खुजली जैसे चर्मरोग हाने का प्रमाण सामने आये है। नर्मदा को होने वाले खतरों को लेकर पर्यावरणविदों की कोई पड्ताल भी सामने नहीं आ सकी है बस नर्मदा के किनारे रहने वाले कुछ लोगों के आधे अधूरे ज्ञान को बिन किसी वैज्ञानिक प्रमाण के स्थानीय मीडिया सहित बड़े अखबारों के संस्करण प्रमुखता से छापकर तरह तरह के तर्क-कुतर्क छापकर लोगो की चिंता बढ़ाते है। कुछेक ज्ञानचंद इसे जैविक खाद होने ओर जानवरों का चारा बनाने की बात कर आश्चर्यचकित करते है ओर नगरपालिका इसे साफ कर अम्बार लगाकर अपनी इतिश्री समझ लेती है।
बीते कुछ सालों में नर्मदा नदी के अस्तित्व पर संकट बढ़ा है। एक तरफ लोग इसे माँ मानकर पूजते रहे दूसरी ओर तमाम गन्दगी और जहर इसके पानी में उड़ेलते रहे। यहीं से शुरू हुए इस सदानीरा और पवित्र नदी के बुरे दिन। मूर्तियाँ, पूजन सामग्री से लेकर शहरों और कस्बों की नालियों का गन्दा सीवेज, खेतों में कीटनाशक और रासायनिक खादों का जहर, मुर्दों की राख कूड़ा कर्कट सब कुछ इसी में प्रवाहित कर पुण्य की कामना करते है। सरकार ने अमृत जल योजना के नाम पर कंपनियों को नर्मदा का जल बेच दीय जो प्रत्येक तटीय गाँव। पंचायत, जनपद, नगरपंचायत, नगरपालिका ओर नगरनिगमों में अपना जलविभाग खोलकर सभी जगह पाइप लाइन बिछाकर नर्मदा के जल का दोहन करने पर तुली है। रेत माफिया अवैध खनन कर नर्मदा के दिल को चीरकर रेत का परिवहन कर रहे है। जंगल काटे जा रहे है , नर्मदा में बिजली का उत्पादन राज्य ओर केंद्र सरकार कर नर्मदा जल का उपयोग कर रही है । रोज हजारों डंफर रेत का उत्खनन हो रहा है यही कारण है की फरवरी मार्च का महिना आए ही नर्मदा कई जगह उथली तो कई जगह सूखने लगती है। हर कभी नर्मदा जल के ऊपर कभी काई- कभी झाई तो कभी जलकुंभी तैरने लगती है जो नर्मदा के स्वास्थ्य के लिए ठीक नहीं है। रसायनिक खाद ओर फेक्टरियों के जहरीले अनुपयोगी हुये निस्तारित झाग ओर पानी से नर्मदा का श्रंगार तहस नहस हो रहा है , नर्मदा खतरे में है ओर सरकार इस जीवित इकाई को मरणासन्न होने से रोकती दिखाई नहीं दे रही है।
