नर्मदापुरम 14 जनवरी 2026 (हिन्द संतरी) होशंगाबाद में पंडित किशोरी लाल सीठा के यहाँ भक्तिमयी माँ भागवती बाई सीठा के घर 13 सितम्बर 1936 को जन्म लेने वाला होनहार बालक आगे डॉ. रघुनन्दन प्रसाद सीठा के नाम से देश दुनिया में अपनी पृथक पहचान बना सके थे। डॉ सीठा के सात भाई और पांच बहनें थी, बाबजूद बड़ा परिवार होने के बाद वे शिक्षा के क्षेत्र में 55 वर्षों तक रहे और प्राचार्य पद से सेवानिर्वृत हुए थे। इन वर्षों में हजारों-हजारों छात्रों परिचितों व स्वजनों से निरंतर सम्मान व आदर प्राप्त होने को वे अपनी पूंजी मानते रहे और सम्प्रति का मन्त्र “””जो बन सका वह परिवार व् समाज को दिया “” से आनन्दित थे।
वे हमेशा कहा करते थे हम कितने वर्ष जिये यह महत्वपूर्ण नहीं है वरन्, हम किस तरह जिये यह महत्वपूर्ण है। उनकी पहचान पुरे नगर में शिक्षाविद के रूप में रही है जो सर्वोत्तम औपचारिक शिक्षा मानवीय उदात्त गुणों में आस्था हिन्दू संस्कृति, हिन्दू धर्म और संस्कारों के प्रति प्रतिबद्ध रहते हुए शिक्षक के रूप में अपने कार्य निष्पादन से संतुष्टि रहे और उनका संकल्प था कि प्रारब्ध के सामने नतमस्तक किन्तु पुरुषार्य का दामन कभी नहीं छोड़ा जाए भले जीवन में कितने भी उतार चढ़ाव आये । वे जीवन पथ पर रामायण का सूत्र “” लाभ हानि जीवन मरण, यश-अपयश विधि हाथ “” की सीख सभी को दिया करते थे।
उन्होंने जीवन में सेकड़ों लेखकों की कृतियों की समीक्षा की,मेरी पुस्तक क्षितिज के पार,किरणों की परीक्षा, आस्था के दीप, देहकलश, अमृतकलश और बुढ़ापे का मुंह काला व्यंग्य की समीक्षा कर मुझे गौरवान्वित किया और उनका कहना था कि मनुष्य जीवन का काल खण्ड (लाईफ टाईम) सीमित और छोटा है तथा इतने बड़े संसार में हम बेहद सामान्य हैं फिर अपने को स्थापित करने के ढेर सारे प्रयास करना बेमानी है। नहीं क्या ? आज हमारे गुरु, समीक्षक, लेखक डॉ सीठा हमारे बीच नही रहे,सुबह वे पंचतत्व में लीनं होंगे, उनके चरणों में यह शब्दपुष्प अर्पित कर में उन्हें कोटिश नमन करता हूँ हजारों-हजारों छात्रों परिचितों व स्वजनों से निरंतर सम्मान व आदर प्राप्त होता रहा है।