
शहरनामा |
नर्मदा की हवा में हरिनाम: कलियुग का सबसे सरल रास्ता, सबसे भारी मन के लिए
नर्मदा किनारे बैठे कितने चेहरे रोज़ दिख जाते हैं—कुछ पानी को निहारते हुए, कुछ हाथ जोड़ते हुए, और कुछ बस अपनी थकान उतारते हुए। इस शहर में नर्मदा सिर्फ नदी नहीं, मन की दवा भी है।
पर सच कहें तो नर्मदा भी मनुष्य की हर उलझन नहीं धो पाती।
क्योंकि थकान शरीर की नहीं—मन की है।
शास्त्र बताते हैं कि युग बदलते गए और मनुष्य की क्षमता घटती गई।
सत्ययुग में लोग पहाड़ जैसे ध्यान में बैठे रहते—घंटों, दिनों, महीनों तक।
त्रेतायुग में नगर एकजुट होकर यज्ञ करते—धुआँ नहीं, बल्कि पुण्य उठता था।
द्वापरयुग में भगवान की सीधी सेवा—शृंगार, भोग, आरती—यह सब धर्म का केंद्र था।
लेकिन आज? कलियुग में?
यहाँ मनुष्य ध्यान में बैठे तो पाँच मिनट में व्हाट्सऐप की घंटी याद आ जाती है।
यज्ञ की व्यवस्था का तो सवाल ही नहीं—लोग पूजा के लिए अगला रविवार खोजते रहते हैं।
और सेवा?
वह भी कई घरों में ऑनलाइन दर्शन तक सिमट चुकी है।
और तब यह श्लोक सामने आता है—
जैसे किसी थके हुए मन को कोमल हथेली छू ले:
“सत्ययुग का फल ध्यान से,
त्रेता का फल यज्ञ से,
द्वापर का फल सेवा से—
पर कलियुग का वही फल सिर्फ हरिनाम से।”
यानी नर्मदा किनारे धीरे से बोला गया “हरे कृष्ण” भी उतना ही प्रभावी है, जितना किसी यज्ञ की अग्नि।
घर की रसोई में काम करते हुए किया गया नाम-स्मरण भी उतना ही पवित्र है, जितना सत्ययुग का कठोर ध्यान।
नर्मदापुरम की गलियाँ इसका प्रमाण हैं।
दोपहर की धूप में भी कहीं से मृदंग की धीमी थाप सुनाई दे जाती है,
सुबह कुछ घरों में दीवारें “हरे कृष्ण” की नरम गूँज से भर जाती हैं,
और शाम को घाटों पर बैठी कोई माँ अपनी बच्ची का हाथ पकड़कर धीरे से कह देती है—
“बेटा, भगवान कठिन नहीं, हम कठिन बन गए हैं।”
कलियुग कठिन नहीं—व्यस्त है।
और भगवान ने ठीक इसी व्यस्त मनुष्य के लिए भक्ति का सबसे सरल रास्ता दिया है—नाम।
जो बार-बार टूटता है, वह नाम से जुड़ता है।
जो खुद को अकेला समझता है, वह नाम में सहारा पाता है।
जो कुछ खो देता है, वह नाम में कुछ वापस पा लेता है।
भावनात्मक सच यह है:
नर्मदा की लहरें चाहे किनारा छूने में समय लें,
पर “हरे कृष्ण” मन को तुरंत छू लेता है।
शहरनामा का संदेश:
अगर आपको लगता है कि जीवन भारी हो गया है,
तो इसे हल्का करने के लिए जटिल साधन मत ढूँढिए—
युग बदल चुका है।
अब भगवान तक पहुँचने का रास्ता बस एक धुन जितना छोटा है—
“हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे…”
और शायद कलियुग की सबसे बड़ी करुणा यही है
कि भगवान दूर नहीं—
बस नाम की दूरी पर हैं।
भक्त चेदीराज दास
