
नर्मदापुरम 23 फरवरी 2026 (हिन्द संतरी ) जिले की डोलरिया तहसील में संघ शताब्दी वर्ष पर प्रमुख जन गोष्ठी कार्यक्रम का आयोजन विशेष अतिथि एवं मुख्य वक्ता के रुप में नर्मदापुरम विभाग प्रचार प्रमुख संतोष नौरिया एवं नर्मदापुर जिला गौ सेवा प्रमुख पुष्पेंद्र जी की उपस्थिति में सम्पन्न हुआ इस अवसर पर अतिथियों ने भारत माता का पूजन किया पश्चात अधिकारी परिचय एवं एकल गीत से कार्यक्रम की शुरुआत हुई |मुख्य वक्ता संतोष नौरिया ने उद्बोधन की शुरुआत मेंकहा कि समाज संगठित होगा तो राष्ट्र सशक्त होगा, इसलिए हिन्दू समाज का संगठित होना जरुरी है उन्होंने संगठन मंत्र ॐ संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् |देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते: हम सब एक साथ चले; एक साथ बोले; हमारे मन एक हो, प्राचीन समय में देवताओं का ऐसा आचरण रहा इसी कारण वे वंदनीय है आदि उदाहरण से समाज की एकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि हजार वर्षों की पराधीनता के पीछे समाज की आंतरिक कमजोरियाँ भी कारण रही हैं। विविध खान-पान, भाषाएँ और मान्यताओं के बावजूद हम सभी एक हैं—यह आत्मबोध जागृत करना आवश्यक है। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि अपने दोषों को दूर कर राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएं।
श्री नोरिया ने कहा कि संघ का दृष्टिकोण स्पष्ट है—संघ किसी का विरोध नहीं करता, न ही कोई राजनीति करता है और न ही प्रतिक्रिया भी नहीं करता है। संघ हिंसा में विश्वास नहीं करता तथा राम और कृष्ण के आदर्शों पर चलने की प्रेरणा देता है। उन्होंने बताया कि संघ बड़ी कंपनियों के सहयोग से नहीं चलता,न पहले लिया और न आगे लेगा। संघ गुरु दक्षिणा के आधार पर स्वावलंबी रूप से संचालित होता है। श्री संतोष नौरिया ने 100 वर्षों की यात्रा का संक्षिप्त वर्णन करते हुए संस्थापक केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन प्रसंग सुनाए। उन्होंने बताया कि बाल्यकाल से ही हेडगेवार जी में राष्ट्रभक्ति की भावना प्रबल थी। महारानी विक्टोरिया के जन्मदिन पर वितरित मिठाई को अपमान समझकर न खाने तथा प्रतिबंध के बावजूद सामूहिक “वंदे मातरम्” का नारा लगाने के कारण उन्हें विद्यालय से निकाला गया।उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलनों में भाग लिया तथा अंग्रेजी शासन के विरुद्ध उग्र भाषण देने के कारण एक वर्ष का कारावास हुआ था, और आयु बढ़ने के साथ उनकी देश भक्ति बढ़ती गई। इस कार्यक्रम कार्यक्रम में उन्नत कृषक, गो-आधारित कृषि करने वाले किसान, बागवानी एवं औषधीय खेती करने वाले कृषक, गोपालक, डॉक्टर, इंजीनियर, वकील, शिक्षक, कर्मचारी एवं अधिकारी, रामायण मंडल,भजन मंडल, गणेश उत्सव एवं दुर्गा उत्सव समितियों के प्रमुख, सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों के प्रतिनिधि, उद्योगपति, व्यापारी, खिलाड़ी एवं विभिन्न संगठनों के प्रमुख उपस्थित रहे।
उनका कहना रहा कि यदि प्रमुख जन “पंच परिवर्तन” के अंतर्गत कुटुंब प्रबोधन, सामाजिक समरसता, स्वदेशी जीवन शैली, पर्यावरण संरक्षण एवं नागरिक शिष्टाचार विचारों क़ो समाज में पहुँचायें तो समाज में ।ज़ब व्यक्ति बदले तो परिवार बदले तो समाज बदले तो राष्ट्र सशक्त बने। इसका अर्थ है कि स्थायी बदलाव ऊपर से नहीं, नीचे से शुरू होता है। आइए इसे विस्तार से समझते हैं:स्वयं से परिवर्तन की शुरुआत होना चाहिए लेकिन सबसे महत्वपूर्ण घटक व्यक्ति है।,यदि व्यक्ति ईमानदार हो अनुशासित हो,नशामुक्त हो,कर्तव्यनिष्ठ हो,शिक्षा और आत्मविकास के प्रति सजग होतो वही परिवर्तन की पहली चिंगारी बनता है। उदाहरण:यदि एक व्यक्ति रिश्वत न लेने का संकल्प ले, तो वह अपने आसपास की व्यवस्था को प्रभावित करता है।यदि एक युवक नशा छोड़ दे, तो कई और प्रेरित होते हैं।संदेश: सुधार की शुरुआत “दूसरों” से नहीं, “स्वयं” से। का निर्माण परिवार में होता है।यदि परिवार संस्कार और अनुशासन सिखाए,बुजुर्गों का सम्मान करे,बच्चों को नैतिक शिक्षा दे,संवाद और एकता बनाए रखे,तो एक स्वस्थ सामाजिक इकाई बनती है।जिस घर में सत्य, सेवा और संयम का वातावरण है, वहाँ से अच्छे नागरिक निकलते हैं। समाज बदले जब अनेक अच्छे परिवार मिलते हैं, तो समाज बनता है। यदि समाज:,जाति-भेद और विभाजन से ऊपर उठे। शिक्षा और स्वावलंबन को बढ़ावा दे.नशामुक्ति और स्वच्छता अपनाए,संगठित होकर समस्याएँ हल करे,तो वह आत्मनिर्भर और सुरक्षित बनता है। संगठित समाज अन्याय और भय से मुक्त रहता है।,क्योंकि समाज की शक्ति उसकी एकता में है।राष्ट्र कोई अलग इकाई नहीं है वह करोड़ों व्यक्तियों और परिवारों का समुच्चय है।जब नागरिक कर्तव्यनिष्ठ हों,परिवार संस्कारित हों रूप से मजबूत सामाजिक रूप से समरस, सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी,और वैश्विक स्तर पर सम्मानित बनता है।राष्ट्र की ताकत उसकी सेना या सरकार से पहले उसके नागरिकों के चरित्र में होती है। इस वाक्य का गहरा अर्थ-यह कोई नारा मात्र नहीं, बल्कि परिवर्तन की वैज्ञानिक प्रक्रिया है:-चरित्र निर्माण से संस्कार निर्माणसे संगठन निर्माण से राष्ट्र निर्माण. यदि हम सीधे राष्ट्र बदलने की बात करें लेकिन व्यक्ति को न बदलें, तो परिवर्तन टिकाऊ नहीं होगा।लेकिन यदि व्यक्ति सुधर जाए, तो बदलाव स्वतः ऊपर तक पहुँचता है। परिवर्तन की शुरुआत स्वयं से करें,परिवार को संस्कारों का केंद्र बनाएं,समाज में संगठन और समरसता बढ़ाएं,तब राष्ट्र स्वाभाविक रूप से सशक्त बनेगा। इस अवसर पर बड़ी संख्या में प्रमुख जन उपस्थित रहे। वन्देमातरम गीत के पश्चात् कार्यक्रम पूर्ण हुआ
