इंदौर । ठीक एक महीने पहले 21 दिसंबर 2025 को भागीरथपुरा में दूषित पानी ने अपनी पहली बलि ली थी। बिहार से अपने बेटे के पास रहने आईं 50 वर्षीय सुमित्रा बाई को क्या पता था कि जिस पानी से वह अपनी प्यास बुझा रही हैं वही उनकी मौत का कारण बनेगा। सुमित्रा बाई की मौत के बाद शुरू हुआ उल्टी-दस्त का सिलसिला देखते ही देखते महामारी में बदल गया और 29 दिसंबर तक एक ही दिन में 150 से ज्यादा मरीज मिलने से पूरे शहर में हाहाकार मच गया।
दहशत के साये में एक महीना
नगर निगम ने पिछले एक महीने में कागजों पर तो बहुत काम किया है। इलाके के 30 प्रतिशत हिस्से में नई टंकी से पानी की सप्लाई शुरू कर दी गई है लेकिन विडंबना देखिए कि प्रशासन पर से जनता का विश्वास इस कदर उठ चुका है कि लोग आज भी उस पानी को पीने से कतरा रहे हैं। घर-घर में आज भी पानी उबालकर पिया जा रहा है या लोग बोतलबंद पानी खरीदने को मजबूर हैं।
लापरवाही और राजनीति की भेंट चढ़ीं जानें
लापरवाही और राजनीति की भेंट चढ़ीं जानें
भागीरथपुरा के रहवासियों का आरोप है कि यदि सुमित्रा बाई की मौत के तुरंत बाद जल विभाग जाग जाता तो शायद बाद में होने वाली मौतों और सैकड़ों लोगों के बीमार होने को रोका जा सकता था। एक तरफ लोग अस्पतालों में जिंदगी की जंग लड़ रहे थे तो दूसरी तरफ राजनीतिक दल एक-दूसरे पर दोषारोपण करने में व्यस्त थे। सीवर और पानी की लाइनों का आपस में मिलना नगर निगम की उस स्मार्ट कार्यप्रणाली की पोल खोल गया जिसका दावा अक्सर मंचों से किया जाता है।
आज की स्थिति: सुधार या सिर्फ खानापूर्ति
आज की स्थिति: सुधार या सिर्फ खानापूर्ति
प्रशासन का दावा है कि लाइनों को दुरुस्त कर दिया गया है और अमृत रेखा जैसे ऐप के जरिए अब रियल-टाइम मॉनिटरिंग की जा रही है। लेकिन भागीरथपुरा की उन तंग गलियों में जाकर देखें तो आज भी कई जगहों पर जलजमाव और गंदगी का अंबार लगा है। सुमित्रा बाई के परिवार जैसे कई अन्य परिवार आज भी न्याय और मुआवजे के इंतजार में हैं।
