यह आदेश न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फडके की एकल पीठ द्वारा पारित किया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोपी ने अपनी पत्नी और नाबालिग बच्चे की गंभीर बीमारी का हवाला देकर अंतरिम जमानत की मांग की थी लेकिन स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट से इन दावों की पुष्टि नहीं हो सकी।
न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत रिकॉर्ड के अनुसार आरोपी ने निजी अस्पताल की मेडिकल रिपोर्ट लगाकर यह दावा किया था कि उसकी पत्नी सेप्टिक शॉक जैसी गंभीर स्थिति से गुजर चुकी है और नाबालिग बच्चा एनीमिया से पीड़ित है। आरोपी का तर्क था कि परिवार की देखभाल के लिए उसकी उपस्थिति अनिवार्य है। हालांकि कोर्ट के निर्देश पर गठित स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में पत्नी की स्थिति को फिलहाल स्थिर बताया और बच्चे को उपचार योग्य अवस्था में पाया।
कोर्ट ने दोनों रिपोर्टों में स्पष्ट विरोधाभास पाया। निजी अस्पताल के दस्तावेज स्वतंत्र मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट से मेल नहीं खाते पाए गए। प्रथम दृष्टया इन दस्तावेजों को भ्रामक मानते हुए न्यायालय ने इस पर कड़ी आपत्ति दर्ज की और CMHO को पूरे मामले की जांच कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए।
यह मामला जून 2025 में हजीरा थाना क्षेत्र में हुए गोलीकांड से जुड़ा है। इस घटना में एक युवक की मौके पर मौत हो गई थी जबकि दूसरा गंभीर रूप से घायल हुआ था। अभियोजन पक्ष के अनुसार वारदात को अंजाम देने में कई आरोपी शामिल थे और सुनियोजित तरीके से फायरिंग की गई थी।जांच के दौरान सामने आया कि राहुल राजावत पर केवल घटनास्थल से जुड़ा होना ही नहीं बल्कि पूरे मामले की साजिश रचने मुख्य आरोपियों को उकसाने उन्हें संरक्षण देने और आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने जैसे गंभीर आरोप हैं। इसी आधार पर उसके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की गंभीर धाराओं और आर्म्स एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज किया गया है।
गौरतलब है कि आरोपी ने यह तीसरी बार अंतरिम जमानत के लिए आवेदन किया था। इससे पहले भी उसकी याचिकाएं खारिज हो चुकी हैं। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट को आधार बनाते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि इस स्तर पर अंतरिम राहत का कोई आधार नहीं बनता।फिलहाल आरोपी न्यायिक अभिरक्षा में रहेगा और हजीरा गोलीकांड मामले की नियमित सुनवाई जारी रहेगी। कोर्ट के इस आदेश को निजी अस्पतालों की मेडिकल रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर कड़ा संदेश माना जा रहा है।
