भोपाल । मध्य प्रदेश में बाल विवाह की समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है जिससे राज्य सरकार के प्रयासों पर सवाल उठने लगे हैं। राज्य में बाल विवाह पर पूर्ण प्रतिबंध होने के बावजूद हर साल इसके मामलों में वृद्धि हो रही है। ताजा जानकारी के अनुसार 2020 से 2025 तक 2,909 बाल विवाह के मामले सामने आए हैं जो कि यह दर्शाता है कि राज्य सरकार की योजनाओं और अभियानों के बावजूद बाल विवाह की समस्या काबू में नहीं आ पा रही है। मध्य प्रदेश विधानसभा के शीतकालीन सत्र में कांग्रेस विधायक जयवर्धन सिंह के द्वारा पूछे गए प्रश्न के उत्तर में महिला एवं बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने बताया कि दमोह जिले में सबसे अधिक 293 बाल विवाह के मामले दर्ज किए गए हैं।
इसके अलावा सागर में 202 गुना में 146 देवास में 121 डिंडौरी में 86 और रतलाम में 78 बाल विवाह के मामले सामने आए हैं। यह आंकड़े राज्य के विभिन्न हिस्सों में बाल विवाह की गंभीरता को स्पष्ट करते हैं। बाल विवाह पर रोक लगाने के लिए राज्य सरकार ने कई योजनाएं चलाई हैं और बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी भी नियुक्त किए गए हैं लेकिन इसके बावजूद स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हो सका है। सरकार की ओर से लाखों रुपये खर्च किए जा रहे हैं लेकिन जमीनी स्तर पर इन प्रयासों का असर नहीं दिख रहा। इस बढ़ते हुए आंकड़े से यह सवाल उठता है कि आखिर क्यों जब बाल विवाह पर प्रतिबंध है और राज्य में इसके खिलाफ कानून भी हैं तब इन मामलों में वृद्धि हो रही है ।
मुख्य कारण क्या हो सकते हैं
बाल विवाह की समस्या की जड़ें समाज के कई स्तरों पर फैली हुई हैं। एक तो यह कि कई क्षेत्रों में अभी भी पारंपरिक सोच और सामाजिक दबाव के कारण लड़कियों की शादी कम उम्र में कर दी जाती है। विशेषकर ग्रामीण इलाकों में यह आदतें अधिक प्रचलित हैं। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण भी परिवार बाल विवाह को एक उपाय समझते हैं जिससे उन्हें आर्थिक बोझ कम हो सके। अक्सर ग्रामीण इलाकों में शिक्षा और जागरूकता की कमी होती है जिससे लोग यह नहीं समझ पाते कि बाल विवाह कितनी गंभीर स्वास्थ्य और मानसिक समस्याओं को जन्म दे सकता है। इसके अलावा पुलिस और प्रशासनिक स्तर पर निगरानी की कमी भी इस समस्या को बढ़ावा देती है। कई बार इन मामलों की सही जानकारी मिलने में देर हो जाती है या फिर शिकायतें दर्ज नहीं की जातीं जिससे अपराधियों को सजा नहीं मिल पाती।
सरकार की योजनाओं का प्रभाव क्यों नहीं
सरकार ने बाल विवाह को रोकने के लिए कई योजनाएं बनाई हैं जिनमें समाज में जागरूकता फैलाना, बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों की नियुक्ति और बाल विवाह की रोकथाम के लिए अभियान चलाना शामिल है। हालांकि इन योजनाओं के बावजूद जमीनी स्तर पर इनका प्रभाव नजर नहीं आ रहा है। इसका कारण यह हो सकता है कि जिन लोगों के पास इन योजनाओं की जानकारी है उनके लिए इनका पालन करना कठिन होता है। इसके अलावा प्रशासनिक अधिकारियों की कमी और ग्रामीण इलाकों में पर्याप्त मॉनिटरिंग का अभाव भी बाल विवाह की दर को बढ़ाने में योगदान करता है।
बाल विवाह एक गंभीर सामाजिक समस्या है जिसे सुलझाने के लिए सिर्फ सरकारी योजनाओं से काम नहीं चल सकता। इसके लिए पूरे समाज को जागरूक करना शिक्षा का स्तर बढ़ाना और प्रशासनिक स्तर पर अधिक मजबूत निगरानी की आवश्यकता है। अगर राज्य सरकार इस दिशा में सख्ती से कदम नहीं उठाती तो आने वाले समय में यह समस्या और भी गंभीर हो सकती है।
