इसका सीधा अर्थ यह है कि जिस जांच की कीमत सामान्य रूप से 100 रुपए मानी जाती है वह अब लगभग 18 रुपए में की जाएगी यही बिंदु पूरे विवाद का केंद्र बन गया है क्योंकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों और पैथोलॉजिस्ट्स का कहना है कि इतनी कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण जांच कर पाना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है
प्रदेश सरकार ने वर्ष 2020 से सरकारी अस्पतालों की पैथोलॉजी सेवाओं को निजी कंपनियों के माध्यम से संचालित करना शुरू किया था इसी क्रम में 12 फरवरी 2026 को नया टेंडर जारी किया गया जो हब एंड स्पोक मॉडल पर आधारित है इस मॉडल में छोटे स्वास्थ्य केंद्रों से सैंपल लेकर जिला स्तरीय प्रयोगशालाओं में जांच की जाती है जिससे लागत और समय दोनों में कमी लाने का प्रयास किया जाता है
टेंडर प्रक्रिया के अनुसार CGHS की दरों को आधार मूल्य माना गया और जो कंपनी सबसे अधिक छूट देगी उसे ठेका दिया जाना तय था 9 मार्च 2026 को टेंडर खुलने पर साइंस हाउस ने 81 प्रतिशत से अधिक छूट देकर पहला स्थान हासिल किया और उसे लगभग 36 करोड़ रुपए सालाना यानी पांच साल में करीब 180 करोड़ रुपए का ठेका मिल गया
हालांकि इस निर्णय के बाद विशेषज्ञों ने गंभीर चिंता जताई है पूर्व स्वास्थ्य अधिकारी डॉ पद्माकर त्रिपाठी का कहना है कि CGHS की दरें पहले से ही बाजार मूल्य से काफी कम होती हैं ऐसे में यदि कोई कंपनी इन दरों से भी 80 प्रतिशत से अधिक छूट देती है तो यह सवाल खड़े करता है कि जांच की गुणवत्ता कैसे सुनिश्चित की जाएगी
वे उदाहरण देते हुए बताते हैं कि कम्प्लीट ब्लड काउंट जैसी सामान्य जांच बाजार में 300 से 400 रुपए तक होती है जबकि CGHS दर लगभग 270 रुपए है इतनी दर पर 81 प्रतिशत छूट के बाद जांच की लागत करीब 50 रुपए रह जाती है जबकि केवल रिएजेंट की लागत ही लगभग 70 रुपए होती है इसके अलावा मशीनों का रखरखाव बिजली और स्टाफ का खर्च अलग होता है ऐसे में इतनी कम कीमत पर सटीक और विश्वसनीय जांच संभव नहीं मानी जा रही
दूसरी ओर कंपनी के सीईओ पुनीत दुबे ने इस छूट को पूरी तरह व्यावहारिक बताया है उनका कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में डायग्नोस्टिक्स सेक्टर में तकनीकी विकास के कारण उपकरण और रिएजेंट की लागत में काफी कमी आई है अब कई चीजें देश में ही कम कीमत पर उपलब्ध हैं जिससे इस तरह की दरें संभव हो पाई हैं
NHM की एमडी डॉ सलोनी सडाना ने भी टेंडर प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा है कि सभी नियमों का पालन किया गया है और तकनीकी बिड में शामिल कई कंपनियों ने 60 प्रतिशत से अधिक छूट की पेशकश की थी ऐसे में सबसे कम दर देने वाली कंपनी को चयनित किया गया है
इस बीच कंपनी का नाम पहले भी विवादों में आ चुका है सितंबर 2025 में आयकर विभाग ने कंपनी से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की थी वहीं कांग्रेस नेता जयवर्धन सिंह ने भी कंपनी पर अनावश्यक जांचों के जरिए भारी भुगतान लेने के आरोप लगाए थे हालांकि कंपनी ने इन सभी आरोपों को खारिज किया है
कुल मिलाकर यह मामला अब सिर्फ एक टेंडर तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि यह प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पारदर्शिता और विश्वसनीयता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि सरकार इस पर क्या रुख अपनाती है और क्या जांच की गुणवत्ता को लेकर उठ रही चिंताओं का समाधान हो पाता है या नहीं
