ओबीसी आरक्षण से जुड़ा यह मामला बुधवार को सूची में छठे नंबर पर दर्ज था। हालांकि सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से न तो सॉलिसिटर जनरल और न ही नियुक्त किए गए वरिष्ठ अधिवक्ताओं में से कोई अदालत में पेश हुआ। उल्लेखनीय है कि राज्य सरकार ने इस प्रकरण में सॉलिसिटर जनरल के साथ चार वरिष्ठ अधिवक्ताओं को नियुक्त कर रखा है, इसके बावजूद किसी का कोर्ट में न पहुंचना सवाल खड़े करता है।
यह पहली बार नहीं है जब सुनवाई टली हो। इससे पहले भी पिछले सप्ताह मामले का नंबर आने के बावजूद सुनवाई नहीं हो सकी थी। उस दौरान भी सरकार की ओर से कोई प्रभावी पहल नहीं की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस रवैये पर असंतोष जताते हुए कहा कि इतने महत्वपूर्ण और लंबे समय से लंबित मामले में सरकार को गंभीरता दिखानी चाहिए।
ओबीसी आरक्षण से जुड़ा यह मामला अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। मध्य प्रदेश सरकार अब तक कई बार बहस के लिए समय मांग चुकी है। राज्य सरकार ने इस पूरे प्रकरण को हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट में ट्रांसफर कराया है, जबकि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट यह स्पष्ट कर चुका है कि राज्य के किसी कानून की संवैधानिकता की जांच करने का पहला अधिकार संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट को होता है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की इस तरह की देरी से न केवल न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित हो रही है, बल्कि ओबीसी वर्ग से जुड़े लाखों युवाओं और अभ्यर्थियों के भविष्य पर भी असर पड़ रहा है। अब सभी की नजरें अगले सप्ताह होने वाली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां सरकार से स्पष्ट और ठोस पक्ष रखने की उम्मीद की जा रही है।
