इस घटना के बाद राजा के साले आकाश तिवारी ने हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की, जिसमें आरोप लगाया गया कि राजा निर्दोष था और उसके खिलाफ कोई अपराध नहीं था, बावजूद इसके उसे पुलिस ने बगैर कारण के गिरफ्तार कर लिया और 30 घंटे तक थाने में हथकड़ी लगाकर रखा। इस मामले की गंभीरता को देखते हुए हाई कोर्ट ने मामले की सुनवाई शुरू की और पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई पर सवाल उठाए।
हाई कोर्ट की प्रतिक्रिया और पुलिस कमिश्नर से सवाल
हाई कोर्ट ने पुलिस के इस कृत्य को गंभीरता से लिया और इसे नागरिक के मौलिक अधिकार का उल्लंघन मानते हुए थाना प्रभारी इंद्रमणि पटेल को सख्त हिदायत दी। कोर्ट ने पटेल से 26 और 27 नवंबर के सीसीटीवी फुटेज प्रस्तुत करने को कहा, ताकि यह सत्यापित किया जा सके कि पुलिस ने क्या सचमुच अनुचित कार्रवाई की थी। हालांकि, जब पटेल कोर्ट में पेश हुए, तो वे अपने साथ सीसीटीवी फुटेज लाने में विफल रहे और इसका कारण तकनीकी गड़बड़ी बताया। इस पर कोर्ट ने नाराजगी व्यक्त की और कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य काफी हैं जो यह सिद्ध करते हैं कि राजा के साथ दुर्व्यवहार किया गया था।
कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर से पूछा कि उन्होंने पटेल के खिलाफ क्या विभागीय और आपराधिक कार्रवाई की है। इस सवाल से यह स्पष्ट हो गया कि कोर्ट अब इस मामले में पटेल के खिलाफ कठोर कदम उठाने की ओर इशारा कर रहा है।
राजा को रिहा किया गया, लेकिन मामला जारी
राजा को 27 नवंबर की रात करीब 11:30 बजे रिहा किया गया, लेकिन इस रिहाई के बाद भी मामला खत्म नहीं हुआ। हाई कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया था कि 30 घंटे के दौरान की सीसीटीवी फुटेज पेश की जाए, लेकिन पटेल ने इसे प्रस्तुत नहीं किया, जिससे पुलिस की कार्रवाई पर और सवाल खड़े हो गए। इस मामले में अगली सुनवाई 9 दिसंबर को निर्धारित की गई है, और पुलिस को इस समय तक अपने पक्ष को स्पष्ट करने का अवसर दिया गया है।
इस घटना से यह सवाल उठता है कि क्या पुलिस को अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करने का अधिकार है, और क्या पुलिस अधिकारियों को नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने पर सजा मिलनी चाहिए। यह मामला न केवल इंदौर बल्कि पूरे देश में पुलिस के बर्ताव और नागरिकों के अधिकारों के प्रति संवेदनशीलता पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है।
इस घटना ने यह सिद्ध कर दिया कि पुलिस के लिए कानून से ऊपर होना कोई विकल्प नहीं है, और हर नागरिक को अपने अधिकारों की रक्षा करने का हक है। हालांकि, मामले की आगे की सुनवाई में अदालत द्वारा की जाने वाली कार्रवाई इस बात का निर्णय करेगी कि क्या थाना प्रभारी इंद्रमणि पटेल के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई की जाती है, या फिर इसे एक और प्रशासनिक लापरवाही के रूप में ही छोड़ दिया जाएगा।
