जब मुकाबला क्रिकेट की सबसे चर्चित प्रतिद्वंद्विता का हो, तो प्रस्तुति भी उसी स्तर की होनी चाहिए। मगर प्रोमो में दिखी सतही हास्य-शैली और बनावटी संवादों ने इसकी गंभीरता को हल्का कर दिया। ऐसा लगा मानो रचनात्मक टीम ने गहराई से सोचने के बजाय आसान और जल्दबाजी वाला रास्ता चुन लिया हो। इससे स्पष्ट है कि जब आप फुकरे को हायर करते हैं, तो विज्ञापन भी फुकरा ही बनता है, जो भद्दा, बेस्वाद और बेमानी लगता है।
दरअसल, फुकरा इंसान, जो यूट्यूब पर रिएक्शन वीडियो के लिए लोकप्रिय हैं, अक्सर दूसरों के कंटेंट पर अपनी प्रतिक्रियाओं से पहचान बनाते हैं। लेकिन अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट की सबसे बड़ी भिड़ंत को सिर्फ हल्के-फुल्के तंज और कृत्रिम मुस्कानों तक सीमित कर देना दर्शकों की भावनाओं के साथ न्याय नहीं करता। इतने बड़े मंच पर रचनात्मकता, जोश और गरिमा की उम्मीद की जाती है, सिर्फ ट्रेंडिंग चेहरे से काम नहीं चलता।
भारत-पाक भिड़ंत को सिर्फ आंकड़ों में क्यों समेट दिया गया?
फैंस को वाह वाला पल चाहिए, ये तो पहले से पता है वाली ऊब नहीं। दर्शक नई दृष्टि चाहते हैं, न कि वही पुरानी सांख्यिकी का दोहराव। क्रिकेट भावनाओं का खेल है, सिर्फ स्कोरलाइन का नहीं। याद कीजिए 2007 का टी20 विश्व कप फाइनल। कमेंट्री गूंजी थी इन द एयर… और श्रीसंत ने कैच पकड़ लिया! उस एक पल ने मैच की दिशा ही नहीं, एक खिलाड़ी की छवि भी बदल दी। मिस्बाह-उल-हक का वह स्कूप शॉट और फिर सालों तक गूंजती एक चुभती पंक्ति मिस्बाह, पांच रन। यही तो ट्रोलिंग की असली बारीकी है: एक लम्हा, एक जुमला, जो इतिहास बन जाए।
भारत-पाक मुकाबले ने हमेशा असली नाटक रचा है। वसीम अकरम और वकार यूनिस की स्विंग, जावेद मियांदाद का शारजाह में आखिरी गेंद पर छक्का, शोएब अख्तर बनाम सचिन तेंदुलकर का 2003 विश्व कप टकराव, इन पलों को किसी कृत्रिम मसाले की जरूरत नहीं थी। ये अपने आप में दंतकथाएं हैं। यह प्रतिद्वंद्विता बनावटी गर्मजोशी से नहीं चलती। इसके पीछे इतिहास की परतें हैं, जज्बातों की तीव्रता है और दो देशों की वह क्रिकेटीय जिद है जो मैदान पर खुलकर सामने आती है। ऐसे में इसे महज एक चेहरे या सतही तंज तक सीमित कर देना, विरोधी टीम पर कटाक्ष नहीं, बल्कि इस ऐतिहासिक टकराव की गरिमा को कम करना है।
व्यंग्य की आड़ में विज्ञापन का स्तर गिरा
1992 विश्व कप सेमीफाइनल को याद कीजिए, बारिश और अचानक बदले लक्ष्य ने मुकाबले की दिशा ही बदल दी। वह साधारण हार नहीं, परिस्थितियों की मार थी। फिर 1999 का सेमीफाइनल, लांस क्लूजनर की अविश्वसनीय पारी टीम को जीत की दहलीज तक ले आई, लेकिन आखिरी क्षण का रन-आउट इतिहास बन गया। यह कमजोरी नहीं, खेल का निर्मम मोड़ था। और हाल का फाइनल, जहां आखिरी ओवर तक लड़ाई खिंची, वह भी साबित करता है कि यह टीम आखिरी सांस तक मुकाबला करती है।
हर बार वे गिरे जरूर, मगर हर बार एक नई कहानी भी छोड़ गए। ऐसे संघर्षों का मजाक उड़ाना, वह भी भोजन गले में अटकने जैसे दृश्य से, हास्य नहीं, संवेदनहीनता है। व्यंग्य तब प्रभावी होता है जब उसमें बुद्धिमत्ता हो; यहां सिर्फ ऊपरी तंज है, गहराई नहीं। क्रिकेट की प्रतिद्वंद्विता को धार देने के लिए इतिहास और भावनाएं काफी हैं। उन्हें सस्ते प्रतीकों में समेट देना खेल और उसके किरदारों दोनों के साथ अन्याय है।
ये भी है बड़ा सवाल
विडंबना यह है कि विरोधियों को छोटा दिखाकर भारत को बड़ा साबित करने की कोशिश में कहीं न कहीं भारतीय दर्शकों को ही कमतर आंक लिया गया। मानो दर्शक सिर्फ बनावटी मुस्कानों और उथले तंज पर हंस पड़ेंगे। मानो उन्हें समझ नहीं कि तीखे व्यंग्य और भोंडे कटाक्ष में फर्क क्या होता है। जब टीआरपी की होड़ में आसान और सस्ती तरकीबें अपनाई जाती हैं, तो अंततः हंसी प्रसारक पर ही लौटती है।
याद है वह सबक?
