दोहे (शीत-ऋतु)
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ठिठुरन, थरथर कँपकँपी, हमें दे रही ठंड।
मौसम धर्म निभा रहा,नियमित-सतत अखंड।
ऋतुएँ नियम न तोड़तीं, हैं न कभी उद्दंड।
ठिठुरन हो या लू चले,मिले न जल का दंड।
हुई ठंड से कँपकँपी, गिरने लगा तुषार।
उपयोगी ऋतु सर्द है,सुख की साझीदार।
ठंडक सबको बाँटती, पाला-ओस-तुषार।
आज यहाँ तो कल वहाँ,पहुँचे हर घर-द्वार।
जाड़ा गहराता घना, होता है हिमपात।
शबनम बदल तुषार में,करती है उत्पात।
मास दिसंबर-जनवरी,बढ़ता गहरा शीत।
ओस रूप ले बर्फ का,करती है भयभीत।
जीव-जंतु कंपित सभी,है असह्य हिमपात।
ठंडक, ओस, तुषार से,प्रकृति करे उत्पात।
धर्म-कर्म ऋतु का भला,वर्षा, गर्मी, ठंड।
शाश्वत रवि नरमी रखे,होता कभी प्रचंड।
घिरा चतुर्दिक कोहरा,लहर-लहर है शीत।
साथ ठंड के बज रहा, दाँतों का संगीत।
गगन धुंध से है भरा, छाया हुआ तुषार।
तापमान गिर कम हुआ,ठंडक बढ़ी अपार।
सर्दी देती कँपकँपी, अग्नि-सूर्य हैं मंद।
सभी संकटापन्न हैं,नहीं मस्त-स्वच्छंद।
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✒️ डॉ शेषपालसिंह ‘शेष’
‘वाग्धाम’–11डी/ई-36डी,
बालाजीनगर कॉलोनी,
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