
“जड़ें ना खोदें अपनी!”
जैसे -जैसे प्रगति की ओर है अग्रसर मानव
अपनी इतिहासिक धरोहरों को भूल रहा
जिनसे संबंध अनमोल अटूट हो
जानबूझकर तज रहा।
मृत खाल की धोंकनी लेती सांस
आज हम लेकर सांसें हो रहे बेजान।
खोजने चले जब अपना अस्तित्व
प्याज़ के छीलते जाओ जितने छिलके
अंत हाथ में कुछ ना आयेगा
अगर परत दर परत खोजना हो
अमलतास की फली को खोलो
प्रत्येक जुड़ी परत में बीज मिलेंगे।
अब जितनी पदवियां, उपाधियां पाते
दूसरे को धकियाने की आदत बढ़ती जाती
कटते अपने ही पूर्वजों से जब
स्वर्णिम अतीत बिसरता जाता
सभ्यता के विकास के विष्लेषण में
मानसिकता की शून्यता पर आ
जाते
विकास का पैमाना सुविधाओं से गिनते
चरित्र पतन , नग्नता दिखती
शून्य को खोजा था हमने
अब शून्य पर आ टिके।
भाषा, वेशभूषा, मान्यताएं, परमपराएं
रखनी होंगी अब हमें संभाल
अपनी सोच को करें केंद्रित उस बिंदु पर
जहां से जुड़े हुए हैं अपनी जड़ों से
गहरी खदानों मिलते रत्न
गहरे सागर से पाते मुक्ता
शाखाओं को दें फैलने
पर अपनी जड़ें स्वयं ना खोदें।
बेला विरदी।
