
धृतराष्ट्रों की महासभा में, अरावली का चीरहरण है।
हार नहीं मानी मुगलों से बन हल्दीघाटी यही लड़ी है।
उतर रही है सुन्दर साड़ी इसकी पीड़ा बहुत बड़ी है।
धन वैभव और दाना पानी सब कुछ अपना देने वाली।
क्रूर कुटिल अनगिन रिपुओं से डटकर लोहा लेने वाली।
हार गयी अपने पुत्रों से सम्मुख दिखता आज मरण है।
आँधी पानी सब कुछ झेला फाँकी इसने रेत धूल है।
जंतु वनस्पति सबको पाला जाने क्या अब हुई भूल है?
तुमको शक्ति सदा दी इसने अब तुमने ही निरुपाय किया।
सबको न्याय दिलाने वाले क्यों तुमने अन्याय किया है?
शरणागत की रक्षा की है इसको देगा कौन शरण है?
अरावली का चीरहरण भी पृष्ठभूमि है महासमर की।
अरे कन्हैया कहाँ छुपे हो चाल कठिन है इस चौसर की।
अपनों को समझाओ गिरिधर फिर गीता का सार चाहिए।
कवि की पीड़ा समझ सको तो फिर तेरा अवतार चाहिए।
रमन बचा लो अरावली को करना तुमको सही वरण है।
