HELIOS का पूरा नाम हाई एनर्जी लेजर विद इंटीग्रेटेड ऑप्टिकल डैजलर एंड सर्विलांस है। करीब 60 किलोवॉट क्षमता वाला यह सिस्टम लॉकहीड मार्टिन ने विकसित किया है। इसे Arleigh Burke क्लास डेस्ट्रॉयर के Aegis कॉम्बैट सिस्टम से जोड़ा गया है, जिससे यह जहाज के रडार और फायर कंट्रोल डेटा के आधार पर लक्ष्य की पहचान कर तुरंत प्रतिक्रिया दे सकता है।
यह प्रणाली दो तरह से काम करती है। पहली सॉफ्ट किल क्षमता जिसमें लेजर दुश्मन ड्रोन के ऑप्टिकल या इंफ्रारेड सेंसर को चकाचौंध कर उन्हें भ्रमित कर देता है, जिससे उनकी निगरानी और निशाना साधने की क्षमता प्रभावित होती है। दूसरी हार्ड किल क्षमता जिसमें केंद्रित थर्मल ऊर्जा लक्ष्य को भौतिक रूप से क्षतिग्रस्त कर देती है, यानी ड्रोन को जला या पिघला सकती है।
इसकी सबसे बड़ी खासियत इसकी लागत है। पारंपरिक मिसाइल इंटरसेप्टर पर जहां लाखों डॉलर खर्च हो सकते हैं, वहीं लेजर शॉट की लागत बेहद कम मानी जाती है। इसमें गोला बारूद की आवश्यकता नहीं होती और लगातार फायर की क्षमता होती है। छोटे और मध्यम आकार के ड्रोन खासकर कम दूरी पर इसके लिए आसान लक्ष्य माने जा रहे हैं।
हालांकि इसकी सीमाएं भी हैं। लेजर हथियार लाइन ऑफ साइट पर काम करता है यानी लक्ष्य सीधा दिखाई देना चाहिए। अधिक नमी, धूल, बादल या समुद्री छींटे बीम की प्रभावशीलता को कम कर सकते हैं। यही कारण है कि अब तक निर्देशित ऊर्जा हथियारों का व्यापक उपयोग सीमित रहा है।
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि कम लागत वाले ड्रोन के बढ़ते उपयोग के बीच ऐसे ऊर्जा आधारित हथियार रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं। ईरान के शाहेद ड्रोन जैसे सस्ते लेकिन बड़े पैमाने पर उपयोग किए जाने वाले सिस्टम के खिलाफ पारंपरिक एयर डिफेंस महंगा पड़ता है। ऐसे में लेजर आधारित प्रणाली कम खर्च में तेज प्रतिक्रिया देने वाला विकल्प बन सकती है।
अमेरिकी रक्षा विभाग बहु स्तरीय समुद्री रक्षा में ऊर्जा आधारित हथियारों को शामिल करने की दिशा में काम कर रहा है। भविष्य में HELIOS को अन्य युद्धपोतों पर भी तैनात किया जा सकता है, हालांकि इसके लिए और परीक्षण किए जाएंगे। यह परीक्षण संकेत देता है कि लेजर हथियार प्रयोगशाला से निकलकर वास्तविक तैनाती के दौर में प्रवेश कर चुके हैं और आने वाले समय में युद्ध की प्रकृति को बदल सकते हैं।
