दरअसल, इन प्लेटफॉर्म्स ने सरकार को बताया कि इस नियम को लागू करने में उन्हें कई तकनीकी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है, इसलिए उन्होंने ज्यादा समय मांगा था। इस पर सरकार ने उनकी बात मानते हुए डेडलाइन आगे बढ़ा दी है। मनीकंट्रोल के सूत्रों के मुताबिक, DoT ने 30 मार्च से कंपनियों को अलग-अलग इस फैसले की जानकारी देना शुरू कर दिया था।
सिर्फ मैसेजिंग ऐप्स ही नहीं, बल्कि मोबाइल बनाने वाली कंपनियां और ऑपरेटिंग सिस्टम देने वाली कंपनियां जैसे Google और Apple ने भी इस नियम को लागू करने के लिए ज्यादा समय मांगा था। खासतौर पर Apple ने कहा कि उसके iOS सिस्टम में कुछ तकनीकी सीमाएं हैं, जिनकी वजह से इस नियम को तुरंत लागू करना मुश्किल है। हालांकि, कंपनी इस पर काम कर रही है और समाधान निकालने की कोशिश कर रही है। इस नियम के तहत अब इन ऐप्स को इस तरह डिजाइन करना होगा कि वे तभी काम करें जब यूजर का रजिस्टर्ड SIM उसी फोन में मौजूद हो। यानी अगर SIM निकाल दिया गया या बदल दिया गया, तो ऐप काम करना बंद कर सकता है।
ऐसे काम करता है यह नियम
SIM Binding नियम को इस तरह तैयार किया गया है कि मैसेजिंग ऐप्स जैसे WhatsApp, Telegram और Signal यूजर के मोबाइल में मौजूद SIM कार्ड से जुड़े रहें। आसानी से समझें तो अगर आपने जिस नंबर से WhatsApp अकाउंट बनाया है, वही SIM आपके फोन में होना चाहिए। अगर SIM हटा दिया गया, बदल दिया गया या बंद हो गया, तो ऐप का एक्सेस सीमित हो सकता है या अकाउंट काम करना बंद कर सकता है। इस नियम का मकसद यह कन्फर्म करना है कि हर अकाउंट किसी असली और एक्टिव मोबाइल नंबर से जुड़ा रहे, जिससे फर्जी अकाउंट्स और साइबर फ्रॉड को रोका जा सके।
जरूरी है यह नियम
दरअसल, इस नियम की जरूरत इसलिए महसूस हुई क्योंकि हाल के समय में ऑनलाइन फ्रॉड, फर्जी WhatsApp अकाउंट और साइबर क्राइम के मामले तेजी से बढ़े हैं। कई लोग बिना एक्टिव SIM के भी मैसेजिंग ऐप्स का इस्तेमाल कर लेते हैं, जिससे उनकी पहचान ट्रैक करना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में SIM Binding नियम से हर अकाउंट को एक असली मोबाइल नंबर से जोड़ना आसान होगा, जिससे सुरक्षा बढ़ेगी और गलत इस्तेमाल पर रोक लगाई जा सकेगी।
