प्रधानमंत्री मोदी ने कनेसेट में अपने भाषण में संकेत दिया कि भारत स्थिर और भरोसेमंद सहयोगियों के साथ सहयोग बढ़ाकर अपनी नागरिकता स्वतंत्रता मजबूत करना चाहता है। इस योजना का केंद्र भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा (आईएमईसी) है। आईएमईसी केवल व्यापारिक मार्ग नहीं है, बल्कि इसे चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (बीआरआई) का संतुलित विकल्प माना जा रहा है। इसका उद्देश्य एशिया और यूरोप के बीच व्यापार और ऊर्जा पर चीन के प्रभाव को कम करना है।
लेख में बताया गया है कि चीन ने परिवहन, ऊर्जा और टेलीकॉम सेक्टर में बड़े निवेश से कई देशों में अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। इसके जवाब में आईएमईसी इंटर्नशिप, साझेदारी और साझा हितों को प्राथमिकता देता है। भारत के लिए इस कॉरिडोर में इजरायल और ग्रीस जैसे देश अहम हैं, जो स्थिर व्यवस्था और तकनीकी क्षमता प्रदान करते हैं। हालांकि, चीन के पास पहले से ही कई बड़े प्रोजेक्ट जैसे चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा और ग्वादर पोर्ट हैं, साथ ही ईरान और खाड़ी देशों के साथ मजबूत संबंध भी उसकी ताकत बढ़ाते हैं।
आईएमईसी के सामने चुनौती सिर्फ चीन का विकल्प प्रस्तुत करने की नहीं, बल्कि खुद को भरोसेमंद और टिकाऊ मॉडल साबित करने की है। लेख के अनुसार, इस कॉरिडोर की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह सुरक्षित, निष्पक्ष और सभी देशों के हितों को संतुलित करने वाला सिस्टम बन सके। इस पहल से भारत अपने दुश्मनों और आर्थिक लक्ष्यों को प्राप्त करते हुए वैश्विक परिदृश्य में अपनी स्थिति मजबूत कर सकता है।
