त्रिपुरा में इस दिशा में सबसे बड़ा कदम देखने को मिला है, जहां ग्रुप C और D श्रेणी के केवल 50 प्रतिशत सरकारी कर्मचारी ही प्रतिदिन कार्यालय आएंगे, जबकि शेष कर्मचारी वर्क फ्रॉम होम व्यवस्था के तहत कार्य करेंगे। राज्य सरकार ने सभी विभागों को साप्ताहिक रोस्टर तैयार करने के निर्देश दिए हैं, ताकि कार्य प्रभावित न हो और संसाधनों की भी बचत हो सके। इसी तरह आंध्र प्रदेश और गोवा में मुख्यमंत्री स्तर पर भी बड़े बदलाव किए गए हैं, जहां वीआईपी काफिले में वाहनों की संख्या को आधा कर दिया गया है। इससे सरकारी दौरों के दौरान ईंधन की खपत में उल्लेखनीय कमी आने की उम्मीद है।
हरियाणा में मुख्यमंत्री ने स्वयं सप्ताह में एक दिन बिना सरकारी वाहन के चलने का निर्णय लिया है, जबकि पंजाब में हर बुधवार को अधिकारियों के लिए चार पहिया वाहनों के उपयोग पर रोक जैसी व्यवस्था लागू की गई है। ओडिशा में भी मुख्यमंत्री के काफिले को सीमित कर मात्र चार वाहनों तक लाया गया है, जिसमें सुरक्षा वाहनों को प्राथमिकता दी गई है। राजस्थान में भी मुख्यमंत्री के काफिले की गाड़ियों की संख्या को घटाकर पहले के मुकाबले काफी कम कर दिया गया है, जिससे सरकारी यात्रा अधिक सरल और कम खर्चीली हो सके।
बिहार और मध्य प्रदेश में भी इस अभियान का प्रभाव देखा जा रहा है, जहां मंत्री और अधिकारी या तो इलेक्ट्रिक वाहनों का उपयोग कर रहे हैं या फिर सीमित काफिले में यात्रा कर रहे हैं। मध्य प्रदेश में कई जनप्रतिनिधियों ने व्यक्तिगत रूप से भी सादगी अपनाने की पहल की है, जिससे जनता में एक सकारात्मक संदेश गया है। उत्तर प्रदेश में भी सरकारी बैठकों और यात्राओं को वर्चुअल मोड में स्थानांतरित करने और काफिले को आधा करने जैसे निर्णय लिए गए हैं, जो डिजिटल और पर्यावरण-अनुकूल प्रशासन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माने जा रहे हैं।
दिल्ली में भी मंत्री स्तर पर सार्वजनिक परिवहन का उपयोग बढ़ा है, जहां कुछ मंत्री मेट्रो और ई-रिक्शा से कार्यक्रमों में पहुंचे। महाराष्ट्र में भी सरकारी खर्चों में कटौती करते हुए विदेश यात्राओं और आयोजनों को सीमित किया गया है। वहीं गोवा में मुख्यमंत्री के काफिले को पहले के मुकाबले आधा कर दिया गया है, जिससे ईंधन बचत के प्रयासों को और मजबूती मिली है।
कुल मिलाकर यह बदलाव केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि एक व्यापक सामाजिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग, पर्यावरण संरक्षण और सरकारी कार्यशैली में सादगी को प्राथमिकता दी जा रही है। यह पहल आने वाले समय में नीतिगत बदलावों और सार्वजनिक व्यवहार पर भी गहरा प्रभाव डाल सकती है, जिससे देश में एक अधिक संतुलित और टिकाऊ प्रशासनिक संस्कृति विकसित होने की उम्मीद की जा रही है।
