डॉ मयंक चतुर्वेदी
दिल्ली की सड़कों पर फिर वही चीख गूंजी है, जिसे इस देश ने 2012 में “निर्भया” के नाम से सुना था। फर्क सिर्फ इतना है कि तारीख बदल गई, चेहरे बदल गए, लेकिन दरिंदगी की मानसिकता अब भी जिंदा है। राजधानी में एक चलती स्लीपर बस के भीतर दो घंटे तक एक महिला की अस्मिता को कुचला गया, फिर उसे सड़क पर फेंक दिया गया।
11 मई की रात एक गरीब कामकाजी महिला रोज की तरह घर लौट रही थी। बस स्टॉप पर खड़ी थी। उसने समय पूछा था, सुरक्षा नहीं मांगी थी। लेकिन जवाब में उसे बस के भीतर घसीट लिया गया। पर्दों से ढकी एसी बस के भीतर इंसान नहीं, दरिंदे बैठे थे। ड्राइवर और हेल्पर ने बारी-बारी से उसकी देह को नोचा। उसकी चीखें बस के बंद शीशों में कैद रहीं। बाहर सड़कें चलती रहीं, शहर सोता रहा और भीतर इंसानियत मरती रही।
दुखद यह है कि उक्त घटना उस समाज के चेहरे पर तमाचा है, जो हर घटना के बाद मोमबत्तियां जलाता है, गुस्सा दिखाता है और फिर अगले ही दिन सब भूल जाता है। इस पर भी सबसे दर्दनाक बात यह है कि यह सब उस देश में हुआ जिसने निर्भया कांड के बाद कसम खाई थी कि अब ऐसा कभी नहीं होगा। कानून बदले, फास्ट ट्रैक कोर्ट बने, निर्भया फंड आया, बड़े-बड़े भाषण हुए, किंतु मानसिकता वहीं की वहीं रही।
एक तरफ प्रधानमंत्री सार्वजनिक वाहन में चलने की अपील करके ऊर्जा बचाने के लिए कह रहे हैं, तो दूसरी ओर बड़ी वाहनों में इस तरह की घटनाएं हो जा रही हैं। आज भी महिलाएं बस में, सड़क पर, दफ्तर में, यहां तक कि अपने घरों में भी सुरक्षित नहीं हैं। NCRB के आंकड़े भी यही बता रहे हैं। रेप, अपहरण, दहेज हत्या, घरेलू हिंसा, हर आंकड़ा बताता है कि महिलाओं के खिलाफ हिंसा हमारे समाज की जड़ों में बैठ चुकी बीमारी बन गई है।
विडंबना देखिए, जिस महिला के साथ इतनी हैवानियत हुई, उसने अस्पताल में भर्ती होने से मना कर दिया क्योंकि घर में खाना कौन बनाएगा? यह सिर्फ गरीबी की बेबसी तो है ही, साथ में यह उस सामाजिक ढांचे की क्रूरता है जहां स्त्री दर्द से ज्यादा परिवार की चिंता करती है।
इस घटना ने फिर साबित किया कि समस्या सिर्फ कठोर कानून बनाने से मिटनेवाली नहीं है। यह चरित्र की समस्या है, सबसे अधिक कार्य इस पर करने की है। क्योंकि इस पूरे घटनाक्रम में अपराधी बस के ड्राइवर और हेल्पर अकेले दोषी नहीं हैं, वह व्यवस्था भी दोषी है जिसने 10 लाख के चालान वाली बस को सड़कों पर दौड़ने दिया। वह सिस्टम भी दोषी है जिसने टूरिस्ट परमिट वाली बस को अवैध सवारी ढोने दी। वह राजनीति भी दोषी है जो महिलाओं की सुरक्षा पर भाषण तो देती है, लेकिन जमीन पर निगरानी और जवाबदेही तय नहीं करती। वह समाज भी दोषी है जोकि चरित्र निर्माण नहीं कर पा रहा है। क्योंकि संस्कार तो परिवार और परिवार की वृहद इकाई समाज से ही मिलेंगे!
हम बेटियों को “सावधान रहना” सिखाते हैं, बेटों को “संस्कार” नहीं। हम लड़कियों पर बहस करते हैं, लड़कों की नजरों पर नहीं। सोशल मीडिया पर महिलाओं का मजाक उड़ाने वाले, फिल्मों में स्त्री को वस्तु की तरह दिखाने वाले, गालियों में मां-बहन का इस्तेमाल करने वाले, ये सब मिलकर उसी जहरीली मानसिकता को मजबूत करते हैं, जिसका अंतिम रूप रेप जैसे अपराधों में दिखता है।
दिल्ली आज फिर सवालों के कटघरे में है। निर्भया के बाद भी अगर चलती बसें महिलाओं के लिए शिकारगाह बनी हुई हैं, तो इसका मतलब है कि हमने सिर्फ कानून बदले, सोच नहीं। अपराधी फांसी पर चढ़े, लेकिन समाज की बीमार मानसिकता जिंदा रही। यही कारण है कि हर कुछ वर्षों बाद कोई नई निर्भया हमारे सामने खड़ी मिलती है।
यह समय सिर्फ गुस्सा दिखाने का नहीं, आत्ममंथन का है। हमें तय करना होगा कि हम कैसा समाज बनाना चाहते हैं, जहां महिला रात में घर लौटते वक्त हर कदम पर भय महसूस करे या वह, जहां उसकी सुरक्षा किसी एहसान की नहीं, उसके अधिकार की तरह सुनिश्चित हो। बच्चों को बचपन से स्त्री सम्मान की शिक्षा देनी होगी, कानून को तेज और निर्मम बनाना होगा, अवैध परिवहन और लापरवाह प्रशासन पर सख्त कार्रवाई करनी होगी और सबसे बढ़कर अपनी सोच बदलनी होगी। क्योंकि जब तक पुरुष की नजर नहीं बदलेगी, तब तक सड़कें, बसें और शहर सुरक्षित नहीं बनेंगे।
जरूरत इस बात की है कि हम सिर्फ घटना पर आक्रोश व्यक्त कर आगे न बढ़ जाएं, बल्कि अपने भीतर झांकें और ऐसा सभ्य, संवेदनशील और सुसंस्कृत समाज बनाने का संकल्प लें, जहां किसी महिला की चीख पर्दों के पीछे दम न तोड़े और किसी बेटी को यह डर लेकर घर से बाहर न निकलना पड़े कि वह लौटेगी भी या नहीं!
