नई दिल्ली। आरएसएस द्वारा पाकिस्तान से संवाद की वकालत किए जाने को लेकर देश की राजनीति में नया विवाद खड़ा हो गया है। शिवसेना (यूबीटी) की नेता और पूर्व राज्यसभा सांसद प्रियंका चतुर्वेदी ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि इस तरह के रुख से पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद के पीड़ितों को न्याय की उम्मीद छोड़ देनी चाहिए।
प्रियंका चतुर्वेदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर टिप्पणी करते हुए इसे “RSS और पाकिस्तान की जुगलबंदी” बताया और आरोप लगाया कि यह बीजेपी के “अमन की आशा” वाले दृष्टिकोण की ओर इशारा करता है। उनके इस बयान के बाद राजनीतिक बहस और तेज हो गई है।
यह विवाद तब और बढ़ा जब आरएसएस के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने पाकिस्तान के साथ बातचीत की आवश्यकता पर जोर दिया और संवाद को आगे बढ़ाने की बात कही। उनके इस रुख का पाकिस्तान ने भी स्वागत किया और कहा कि शांति, सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बातचीत जरूरी है।
इस मुद्दे पर पूर्व सेना प्रमुख मनोज नरवणे ने भी आरएसएस नेता के बयान का समर्थन करते हुए कहा कि भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद जरूरी है, हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि बातचीत का मतलब सुरक्षा विकल्पों को छोड़ना नहीं है।
इसके अलावा नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फ़ारूक़ अब्दुल्ला ने भी बातचीत के विचार का समर्थन करते हुए कहा कि युद्ध किसी भी समस्या का समाधान नहीं है और दोनों देशों के बीच संवाद जारी रहना चाहिए।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरे विवाद ने एक बार फिर भारत-पाकिस्तान नीति को लेकर अलग-अलग विचारधाराओं को सामने ला दिया है। एक तरफ जहां कुछ नेता बातचीत को समाधान मानते हैं, वहीं दूसरी ओर इसे आतंकवाद के पीड़ितों के साथ न्याय से जोड़कर विरोध भी किया जा रहा है।
कुल मिलाकर यह मुद्दा अब केवल कूटनीति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि देश की घरेलू राजनीति में भी तीखी बहस का कारण बन गया है, जहां संवाद बनाम सख्त रुख की लड़ाई साफ दिखाई दे रही है।
