प्रदर्शन के दौरान कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी करते हुए कहा कि आदिवासी समाज की पहचान और अस्तित्व को कमजोर करने की कोशिश की जा रही है। डॉ. विक्रांत भूरिया ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार जानबूझकर ‘आदिवासी’ शब्द से परहेज कर रही है और ‘वनवासी’ जैसे शब्दों के जरिए समाज को सीमित दायरे में दिखाने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि आदिवासी केवल जंगलों में रहने वाला समुदाय नहीं, बल्कि इस देश के मूल निवासी हैं, जिनकी अपनी संस्कृति, परंपरा और गौरवशाली इतिहास है।
डॉ. भूरिया ने कहा कि जल, जंगल और जमीन से आदिवासियों को दूर करने की साजिश लंबे समय से चल रही है। अब भाषा और शब्दों के माध्यम से भी उनकी पहचान बदलने का प्रयास किया जा रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार जंगलों और प्राकृतिक संसाधनों को बड़े औद्योगिक घरानों के हवाले करना चाहती है और आदिवासी समाज को केवल मजदूर बनाकर रखना चाहती है।
उन्होंने कांग्रेस सरकार के कार्यकाल का जिक्र करते हुए कहा कि उस समय विश्व आदिवासी दिवस पर सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया था, लेकिन वर्तमान सरकार ने उसे समाप्त कर आदिवासी समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। डॉ. भूरिया ने कहा कि आज आदिवासी समाज शिक्षा और प्रशासनिक क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ रहा है। समाज के लोग डॉक्टर, इंजीनियर, कलेक्टर और आईपीएस जैसे बड़े पदों तक पहुंच रहे हैं। ऐसे में उन्हें ‘जंगली’ या ‘वनवासी’ जैसे शब्दों से संबोधित करना अपमानजनक है और इसे किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
प्रदर्शन के दौरान प्रशासन ने शुरुआती दो बार पुतला दहन रोकने का प्रयास किया, लेकिन कार्यकर्ता पीछे नहीं हटे। तीसरी कोशिश में कार्यकर्ताओं ने अमित शाह का पुतला जलाकर विरोध दर्ज कराया। इस दौरान राजवाड़ा चौक पर काफी देर तक हंगामे की स्थिति बनी रही।
कार्यक्रम में जसवंत सिंह भाबर, नटवर डोडियार, नरवेश अमलियार सहित बड़ी संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता और आदिवासी समाज के लोग मौजूद रहे। प्रदर्शनकारियों ने गृहमंत्री से सार्वजनिक माफी की मांग करते हुए चेतावनी दी कि यदि आदिवासी समाज की पहचान और सम्मान से जुड़े मुद्दों पर इसी तरह की भाषा का इस्तेमाल जारी रहा, तो आंदोलन और तेज किया जाएगा।
