मामला हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के संयुक्त सचिव योगेश सोनी द्वारा दायर याचिका से जुड़ा है। याचिका में महाधिवक्ता कार्यालय के अंतर्गत 157 सरकारी लॉ ऑफिसर्स की नियुक्तियों पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि चयन प्रक्रिया में नियमों का पालन नहीं किया गया और नियुक्तियों में मनमानी, पक्षपात तथा पात्रता संबंधी मानकों की अनदेखी की गई। याचिकाकर्ता ने पूरी भर्ती प्रक्रिया की न्यायिक जांच की मांग भी की है।
याचिका में कहा गया है कि सरकारी लॉ ऑफिसर नियुक्त किए जाने के लिए निर्धारित नियमों के अनुसार कम से कम दस वर्ष का अधिवक्ता अनुभव होना आवश्यक है। आरोप है कि नियुक्त किए गए कुछ लोगों के पास निर्धारित अनुभव उपलब्ध नहीं था, फिर भी उन्हें सरकारी वकील नियुक्त कर दिया गया। इन आरोपों के आधार पर याचिकाकर्ता ने नियुक्तियों की वैधता पर प्रश्न उठाते हुए न्यायालय से हस्तक्षेप की मांग की है।
सुनवाई के दौरान यह मुद्दा भी सामने आया कि पूर्व में जारी न्यायालय के नोटिस संबंधित पक्षों तक पहुंचाने में भी कठिनाई आई। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि कुछ अवसरों पर नोटिस स्वीकार नहीं किए गए। अदालत ने इस तथ्य को रिकॉर्ड पर लेते हुए मामले की गंभीरता पर चिंता व्यक्त की। इसके बाद राज्य सरकार को जवाब दाखिल करने के लिए कई अवसर दिए गए, लेकिन निर्धारित समय में जवाब प्रस्तुत नहीं किया जा सका।
लगातार देरी पर असंतोष जताते हुए हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब मामले में और विलंब स्वीकार नहीं किया जाएगा। अदालत ने महाधिवक्ता को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह बताने का निर्देश दिया है कि अब तक जवाब क्यों प्रस्तुत नहीं किया गया और नियुक्तियों से जुड़े आरोपों पर सरकार का आधिकारिक पक्ष क्या है। अदालत का यह रुख इस मामले को गंभीरता से लिए जाने का संकेत माना जा रहा है।
मामले की अगली सुनवाई 10 अगस्त को निर्धारित की गई है। इस दौरान महाधिवक्ता की व्यक्तिगत उपस्थिति के साथ राज्य सरकार से विस्तृत जवाब अपेक्षित रहेगा। अदालत में प्रस्तुत होने वाले उत्तर के आधार पर आगे की न्यायिक प्रक्रिया तय होगी। फिलहाल इस मामले में किसी भी पक्ष के आरोपों पर न्यायालय ने अंतिम टिप्पणी नहीं की है और विवाद विचाराधीन है।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि सरकारी लॉ ऑफिसर्स राज्य सरकार की ओर से विभिन्न न्यायालयों में महत्वपूर्ण मामलों की पैरवी करते हैं। ऐसे में उनकी नियुक्ति प्रक्रिया की पारदर्शिता, पात्रता और नियमों के पालन को लेकर उठे प्रश्नों पर न्यायिक परीक्षण की प्रक्रिया अब आगे बढ़ेगी। अगली सुनवाई में अदालत के समक्ष प्रस्तुत होने वाले जवाब पर सभी की नजरें टिकी रहेंगी।
