
#महाभारत प्रसंग संग वर्तमान भारत
यादव और ब्राह्मण का रिश्ता सिर्फ रक्त का नहीं बल्कि राष्ट्र निर्माण का भी है।
किसी भी भारतीय धर्म ग्रंथों या संस्कृति में जातिगत व्यवस्था की बात नहीं कही गई है। हां मानव मात्र के काम करने की रूचि के आधार पर वर्ण व्यवस्था निर्धारित की गई है। आज़ भले ही राजनीतिक वोट बैंक ने हमें जातियों में बांट दिया है परन्तु इतिहास के पन्ने पलट कर देखिए हम सब एक थे। आइए आज़ मैं ब्राह्मण और यदुवंशी के संबंधों की चर्चा करता हूं।आशा है आपको रूचिकर लगेगी।
“राजा ययाति की पत्नी देवयानी के पिता ब्रह्मर्षि शुक्राचार्य थे, ययाति के वंशज श्रीकृष्ण।इसलिए ब्राह्मण-यदुवंश का रिश्ता सिर्फ और सिर्फ रक्त का ही नहीं बल्कि राष्ट्र के निर्माण का रिश्ता है।”
कैसे और क्यों -कथा आपको जाननी ही चाहिए।
ययाति-देवयानी की कथा ब्राह्मण-यदुवंश के संबंध की सबसे पुरानी और गहरी मिसाल है। महाभारत, आदि पर्व के अध्याय 75-83 में पूरी कथा है।
“कथा है कि ययाति ने देवयानी से विवाह कर ब्रह्म -क्षत्र – यदूवंश एकता दिखाई जिसने कालांतर में भारत को सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। आज यादव समाज को भी ब्रह्मबल के साथ चलने की आवश्यकता है– शिक्षा, शोध, संस्कृति के साथ चलकर अपने क्षत्रप बल का प्रयोग करें तो हम सशक्त भारत की कल्पना कर सकते हैं।
राजा ययाति और देवयानी का प्रेम प्रसंग – कथा
देवयानी गुरु शुक्राचार्य – असुरों के गुरु, ब्रह्मज्ञान की मूर्ति की पुत्री थी।
ययाति थे चंद्रवंशी राजा, यदुवंश के पूर्वज। यदु ही यादवों के आदि पुरुष हैं।
मतलब: एक तरफ ब्रह्मबल, दूसरी तरफ क्षत्रबल। महाभारत कहता है – राष्ट्र तभी चलता है जब ये दोनों मिलकर चलें।
प्रेम कैसे हुआ?
राजा ययाति शिकार करते समय वन में भटक गए। वहीं शुक्राचार्य का आश्रम था।
ब्रह्मॠषि शुक्राचार्य की पुत्री अतिसुंदर तीक्ष्ण बुद्धि मति देवयानी और दानव राजा वृषपर्वा की पुत्री खुबसूरत शर्मिष्ठा सखी थी लेकिन दोनों की यही सुंदरता एक समय कलह का कारण बन गया। एक दिन दोनों कुएं के पास झगड़ पड़ीं। शर्मिष्ठा ने देवयानी को कुएं में धकेल दिया।
देवयानी प्रसंग:
ययाति जो जंगल में भटक रहे थे उनकी नजर पड़ी और उन्होंने देवयानी को कुएं से निकाला। आँखें मिलीं – राजधर्म और ब्रह्मपुत्री का पहला मिलन।
राजा ययाति ने विवाह का प्रस्ताव दिया और महर्षि शुक्राचार्य ने स्वीकार करते हुए अपनी पुत्री का हाथ ययाति को दिया। शर्त एक थी – शर्मिष्ठा तुम्हारी दासी बनेगी, पत्नी नहीं। ययाति ने हाँ कर दी।
ययाति ने ब्राह्मण कन्या से विवाह कर दिखाया कि यादव केवल बाहुबल नहीं, संबंधों का सम्मान भी जानते हैं।
शर्मिष्ठा प्रसंग:
बाद में ययाति का शर्मिष्ठा से भी विवाह हुआ। दरअसल राजा ययाति वास्तव में शर्मिष्ठा से ही प्रेम करते थे और यह बात जब देवयानी को पता चला तो उसने ही दोनों का विवाह कराया क्योंकि दोनों सखी थीं।
यदु और कुरू वंश
इतिहास गवाह है देवयानी तथा शर्मिष्ठा से ही “यदु” और “पुरु” दो वंश चले। पुरु वंश में कुरु-पांडव हुए, यदु वंश में श्रीकृष्ण। मतलब देवयानी के वंशज ब्राह्मणों से जुड़े, शर्मिष्ठा के वंशज यादव ।
शुक्राचार्य का शाप-वरदान
कहानी बड़ी हो इसे यहीं समाप्त करते हुए बताना है कि ययाति ने असमय बुढ़ापा मांग लिया था, तो शुक्राचार्य ने शाप दे दिया। बाद में ययाति ने अपने बेटों से जवानी मांगी। यदु ने मना कर दिया। तभी यदुवंश को “स्वतंत्र बुद्धि” का वरदान मिला। यादव समाज तब से अपने विवेक से चलने वाले माने जाने लगे हैं।
“शर्मिष्ठा से भी राजा ययाति को प्रेम था – “राजनीति की मजबूरी थी, पर मर्यादा ययाति ने निभाई।”
इसीलिए ब्रह्म कूल, यदुवंशी और क्षत्रिय ये तीनों एक ही कूल से संबंधित हैं जिनका संबंध सिर्फ रक्त संचार से नहीं बल्कि राजनीतिक और राष्ट्रीय अस्मिता की शक्ति का आधार है क्यों न हो जब ये तीनों संबंध में हैं।
यदुवंश की जय। श्रीकृष्ण की जय।
(लेखक एक शिक्षाविद् कवि लेखक वरिष्ठ पत्रकार सह सलाहकार संपादक और राजनीतिक विश्लेषक है।)
