नई दिल्ली। क्षेत्रीय सिनेमा के इतिहास में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले भोजपुरी फिल्म जगत के दो सबसे बड़े सूरमाओं के बीच की पुरानी अदावत एक बार फिर से खुलकर सार्वजनिक मंच पर आ गई है। लंबे समय तक एक-दूसरे के धुर विरोधी रहे मनोज तिवारी और रवि किशन के बीच की खाई राजनीतिक रूप से भले ही पट गई हो, लेकिन अतीत के व्यावसायिक मतभेद आज भी पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं।
हाल ही में दिए गए एक बेबाक साक्षात्कार के दौरान मनोज तिवारी ने भोजपुरी सिनेमा के उत्थान और उसकी वैश्विक लोकप्रियता को लेकर कई ऐसे दावे किए हैं, जिससे दोनों कलाकारों के प्रशंसकों के बीच एक नया विवाद खड़ा हो गया है। इस बातचीत के दौरान जब उनसे यह पूछा गया कि इस फिल्म जगत को पुनर्जीवित करने और एक-दूसरे को मुख्यधारा में लाने का असल श्रेय किसे जाता है, तो मनोज तिवारी ने बिना किसी हिचकिचाहट के खुद को भोजपुरी के तीसरे दौर का मार्गदर्शक घोषित कर दिया।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि उनके आने से पहले रवि किशन सहित कई अन्य कलाकार इस फिल्म जगत में सक्रिय तो थे, लेकिन वे कोई खास प्रभाव छोड़ने या इस सिनेमा को एक मुनाफे वाले उद्योग में बदलने में पूरी तरह से असफल साबित हो रहे थे।
इस वैचारिक जंग में अपने पक्ष को मजबूती से रखने के लिए मनोज तिवारी ने अपनी ऐतिहासिक फिल्म के बॉक्स ऑफिस आंकड़ों का भी खुलकर हवाला दिया। उन्होंने बताया कि उनकी बेहद चर्चित फिल्म ने मात्र तीस लाख रुपए के अत्यंत सीमित बजट में बनकर रिकॉर्ड तोड़ कमाई का इतिहास रचा था, जिसने न केवल पूरे देश का ध्यान इस क्षेत्रीय सिनेमा की तरफ आकर्षित किया बल्कि इसी एकलौती फिल्म की ऐतिहासिक सफलता के बाद से भोजपुरी में लगभग दो हजार नई फिल्मों के निर्माण का रास्ता साफ हुआ। अपनी बात को और अधिक आक्रामक मोड़ देते हुए उन्होंने समकालीन कलाकारों की उस दौर की आर्थिक स्थिति पर भी टिप्पणी की।
उन्होंने दावा किया कि जब वे सफलता के शिखर पर थे और बतौर मुख्य अभिनेता फिल्मों के लिए प्रतिदिन के हिसाब से एक से डेढ़ लाख रुपए तक की भारी-भरकम फीस ले रहे थे, उस दौर में रवि किशन को पूरी फिल्म के काम के एवज में केवल पच्चीस हजार रुपए ही मिलते थे। उन्होंने कटाक्ष करते हुए यह भी कहा कि उन्होंने ही इन सभी कलाकारों को यह सिखाया कि किस प्रकार फिल्म उद्योग में अपनी कड़ी मेहनत के लिए सही और बड़ा पारिश्रमिक मांगा जाता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति में सुधार हो सके।
हालांकि, वर्तमान परिदृश्य की बात करते हुए मनोज तिवारी ने यह भी साफ किया कि समय के साथ अब उनके आपसी संबंधों में काफी बदलाव आ चुका है। वर्तमान में दोनों ही दिग्गज कलाकार भारतीय जनता पार्टी के बैनर तले सक्रिय राजनीति का हिस्सा हैं और एक ही दल में होने के कारण अब उनके बीच पहले जैसी सीधे तौर पर कोई व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता नहीं बची है। वे दोनों अब अच्छे मित्र के रूप में एक-दूसरे के साथ खड़े दिखाई देते हैं और राजनीतिक रैलियों तथा सार्वजनिक कार्यक्रमों में एक मंच भी साझा करते हैं।
परंतु, जब बात भोजपुरी सिनेमा को देश-दुनिया में असली पहचान दिलाने और उसकी रीढ़ बनने की आती है, तो दोनों के बीच की यह वैचारिक जंग और खुद को श्रेष्ठ साबित करने की होड़ आज भी वैसी ही बनी हुई है जैसी सालों पहले फिल्मों के बॉक्स ऑफिस क्लैश के दौरान हुआ करती थी। इस ताजा बयानबाजी ने यह साफ कर दिया है कि भले ही समय बदल गया हो और दोनों के रास्ते राजनीति में आकर मिल गए हों, लेकिन भोजपुरी सिनेमा के इतिहास में अपना नाम सबसे ऊपर दर्ज कराने की यह लड़ाई इतनी जल्दी शांत होने वाली नहीं है।
