ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि संकट की शुरुआत के साथ ही भारत ने पारंपरिक सहयोगी देशों के साथ समन्वय और मजबूत किया। संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और कतर जैसे प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता देशों के साथ पहले से स्थापित रणनीतिक संबंध इस दौरान काफी उपयोगी साबित हुए। उच्च स्तर पर लगातार संपर्क बनाए रखने से कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति बाधित नहीं हुई और ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती मिली।
भारत ने केवल खाड़ी देशों पर निर्भर रहने के बजाय ऊर्जा आयात के स्रोतों का भी विस्तार किया। रूस, अमेरिका, वेनेजुएला, नाइजीरिया, गैबॉन और गुयाना जैसे देशों से भी कच्चे तेल की खरीद बढ़ाई गई। इस रणनीति का उद्देश्य किसी एक क्षेत्र में संकट की स्थिति पैदा होने पर वैकल्पिक स्रोतों के माध्यम से आपूर्ति बनाए रखना था। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा आयात का विविधीकरण भारत की दीर्घकालिक ऊर्जा नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।
वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के बावजूद भारत में ईंधन की कीमतों को अपेक्षाकृत नियंत्रित रखा गया। इसके लिए सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की तेल कंपनियों ने समन्वित रणनीति अपनाई। बढ़ी हुई लागत का एक बड़ा हिस्सा स्वयं वहन किया गया, जिससे आम उपभोक्ताओं पर महंगाई का अतिरिक्त बोझ नहीं पड़ा। साथ ही करों में राहत और मूल्य प्रबंधन के उपायों ने भी बाजार को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
सरकार ने घरेलू स्तर पर भी ऊर्जा प्रबंधन को प्राथमिकता दी। एलपीजी के घरेलू उत्पादन में वृद्धि, ईंधन वितरण प्रणाली की लगातार निगरानी और आवश्यक क्षेत्रों को प्राथमिकता के आधार पर आपूर्ति सुनिश्चित करने जैसे कदम उठाए गए। इससे देशभर में किसी बड़े ईंधन संकट की स्थिति नहीं बनी और आवश्यक सेवाओं पर भी इसका प्रभाव सीमित रहा।
विशेषज्ञों का कहना है कि कई देशों में ऊर्जा संकट के कारण ईंधन की कमी, लंबी कतारें और आवश्यक सेवाओं पर असर देखने को मिला, लेकिन भारत अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति में रहा। इसका प्रमुख कारण समय पर लिए गए नीतिगत फैसले, मजबूत अंतरराष्ट्रीय साझेदारी और संकट प्रबंधन की प्रभावी रणनीति रही। इससे न केवल ऊर्जा आपूर्ति सुचारु बनी रही बल्कि आर्थिक गतिविधियों को भी निरंतर गति मिलती रही।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियां यह संकेत देती हैं कि भविष्य में भी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर दीर्घकालिक रणनीति अपनाना आवश्यक होगा। वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का विकास, आयात के विविध विकल्प और मजबूत अंतरराष्ट्रीय सहयोग भारत को संभावित वैश्विक संकटों से सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। पश्चिम एशिया संकट के दौरान अपनाई गई रणनीति को इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा रहा है।
