22 सितंबर 1998 की रात करीब दो बजे मिशन सेंटर की घंटी बजी। बाहर मौजूद कुछ लोगों ने बताया कि उनके साथ एक बीमार बच्चा है जिसे तुरंत इलाज की जरूरत है। मानवता के नाते दरवाजा खोला गया लेकिन अगले ही पल पूरा माहौल बदल गया। हथियारों से लैस 26 से अधिक बदमाश परिसर में घुस आए और पूरे मिशन सेंटर को अपने कब्जे में ले लिया।
बदमाशों ने वहां मौजूद लोगों के साथ मारपीट की और कमरों की तलाशी लेते हुए नकदी तथा कीमती सामान लूट लिया। करीब दो घंटे तक परिसर में दहशत का माहौल बना रहा। बाहर गांव में सन्नाटा पसरा था जबकि अंदर चीख पुकार और हिंसा का दौर चलता रहा। लगातार आ रही आवाजों से कुछ ग्रामीण जागे और धीरे धीरे मिशन सेंटर की ओर पहुंचे। सुबह होने तक लोग परिसर के बाहर इकट्ठा हो गए। मुख्य गेट टूटा हुआ था और अंदर का दृश्य देखकर हर कोई स्तब्ध रह गया।
घटना के समय मिशन सेंटर के प्रभारी फादर वहां मौजूद नहीं थे। वे दूसरे गांव गए हुए थे। सूचना मिलने पर लौटे और हालात देखकर सीधे पुलिस थाने पहुंचे। शुरुआती शिकायत में डकैती का जिक्र किया गया क्योंकि रिपोर्ट दर्ज कराने वाला व्यक्ति घटना के समय मौके पर मौजूद नहीं था।
जांच के दौरान पुलिस ने पीड़ित चारों नर्सों के अलग-अलग बयान दर्ज किए। उनके बयानों के बाद मामला पूरी तरह बदल गया। उन्होंने बताया कि लूटपाट के दौरान उनके साथ सामूहिक दुष्कर्म भी किया गया। इसके बाद पुलिस ने मेडिकल परीक्षण कराया और घटनास्थल से फॉरेंसिक साक्ष्य जुटाए। कपड़ों समेत अन्य सबूत जांच के लिए भेजे गए।
यह घटना सामने आते ही पूरे झाबुआ जिले में सनसनी फैल गई। सामाजिक सेवा और स्वास्थ्य कार्यों के लिए पहचाने जाने वाले मिशन सेंटर में हुई इस जघन्य वारदात ने प्रदेश ही नहीं बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी व्यापक प्रतिक्रिया पैदा की। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटना को गंभीरता से लिया गया और मिशनरी संस्थानों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई गई।
इस मामले ने कई अहम सवाल खड़े किए। आखिर इतनी बड़ी संख्या में हथियारबंद बदमाश मिशन सेंटर तक कैसे पहुंच गए। वारदात के पीछे उनकी मंशा क्या थी। लूट के साथ इतनी क्रूर घटना को अंजाम क्यों दिया गया और इतनी बड़ी साजिश की भनक पहले क्यों नहीं लगी। इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने के लिए पुलिस ने व्यापक जांच शुरू की और यह मामला मध्य प्रदेश की सबसे चर्चित क्राइम फाइल्स में शामिल हो गया।
