नई दिल्ली । अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर वैश्विक ऊर्जा बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है। क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर बढ़ी अनिश्चितता के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में छह प्रतिशत से अधिक की तेजी दर्ज की गई, जिससे ब्रेंट क्रूड लगभग 80 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक पहुंच गया। तेल बाजार में आई इस तेजी का प्रभाव वैश्विक निवेशकों की धारणा पर भी पड़ा और भारतीय शेयर बाजार में व्यापक बिकवाली देखने को मिली।
बाजार के आंकड़ों के अनुसार, ब्रेंट क्रूड की कीमत में लगभग 6.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि डब्ल्यूटीआई क्रूड भी उल्लेखनीय तेजी के साथ करीब 75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। विश्लेषकों का मानना है कि मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बनी आशंकाओं ने तेल की कीमतों को ऊपर धकेलने में प्रमुख भूमिका निभाई है। निवेशकों को आशंका है कि यदि तनाव और बढ़ता है तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है।
तनाव उस समय और बढ़ गया जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के खिलाफ नए सैन्य हमलों की जानकारी देते हुए कहा कि हालिया घटनाक्रम के बाद दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम प्रभावी नहीं रहा। उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिकी कार्रवाई होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले वाणिज्यिक जहाजों पर हुए हमलों के जवाब में की गई है। ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व की तीखी आलोचना करते हुए भविष्य में किसी समझौते या वार्ता की संभावना पर भी संदेह व्यक्त किया।
होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री ऊर्जा मार्गों में से एक माना जाता है। वैश्विक स्तर पर बड़ी मात्रा में कच्चे तेल का परिवहन इसी रास्ते से होता है। ऐसे में इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार का सैन्य तनाव या सुरक्षा जोखिम अंतरराष्ट्रीय तेल बाजारों पर तत्काल प्रभाव डालता है। निवेशकों और ऊर्जा कंपनियों की नजर फिलहाल इस क्षेत्र की स्थिति पर बनी हुई है, क्योंकि आगे की घटनाएं तेल की कीमतों की दिशा तय कर सकती हैं।
कच्चे तेल की कीमतों में आई इस तेजी का असर भारतीय वित्तीय बाजारों पर भी दिखाई दिया। कारोबार के दौरान सेंसेक्स में 1,600 अंकों से अधिक की गिरावट दर्ज की गई, जबकि निफ्टी भी दो प्रतिशत से ज्यादा फिसल गया। इसके साथ ही मिडकैप और स्मॉलकैप सूचकांकों में भी उल्लेखनीय कमजोरी देखने को मिली। बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि ऊंची तेल कीमतें आयात लागत बढ़ा सकती हैं, जिससे महंगाई, चालू खाते के घाटे और कॉर्पोरेट लागत पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव लंबे समय तक बना रहता है तो वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता जारी रह सकती है। ऊर्जा कीमतों में लगातार बढ़ोतरी का असर परिवहन, विनिर्माण और अन्य तेल-निर्भर क्षेत्रों पर भी पड़ सकता है। फिलहाल निवेशकों की निगाहें मध्य पूर्व की स्थिति, कूटनीतिक प्रयासों और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति से जुड़े आगामी घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं, क्योंकि इन्हीं के आधार पर आने वाले दिनों में तेल बाजार और शेयर बाजार की दिशा तय होगी।
