“रूल विदेशी, सहूलियत देसी भी नहीं… आखिर यह कैसा न्याय?”
आज देश का आम नागरिक एक अजीब विडंबना के बीच खड़ा दिखाई देता है। उससे अपेक्षा की जाती है कि वह कानून का अक्षरशः पालन करे, लेकिन जब वही नागरिक अपने अधिकारों की बात करता है, तो उसे धैर्य का उपदेश दे दिया जाता है।
लगता है जैसे व्यवस्था का नया सिद्धांत बन गया है—नियम आम आदमी के लिए, और अपवाद ताकतवरों के लिए।
जनता से कहा जाता है कि नियमों का सम्मान करो। जनता करती भी है। टैक्स भी देती है, कतार में भी खड़ी रहती है, जुर्माना भी भरती है, कानून भी मानती है। लेकिन जब वही जनता न्याय, पारदर्शिता और जवाबदेही मांगती है, तब उसके हिस्से में आश्वासन, प्रतीक्षा और कभी-कभी उपेक्षा ही आती है।
लोकतंत्र का अर्थ केवल नागरिकों पर नियम लागू करना नहीं है। लोकतंत्र का पहला सिद्धांत है—सत्ता भी उतनी ही जवाबदेह हो, जितना नागरिक कानून के प्रति उत्तरदायी है।
देश तब मजबूत नहीं बनता जब केवल जनता अनुशासन में रहे; देश तब मजबूत बनता है जब सत्ता भी अपने आचरण से कानून के प्रति समान सम्मान दिखाए।
सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब लोगों के मन में यह भावना घर करने लगे कि न्याय सबके लिए समान नहीं है। जिस दिन यह विश्वास कमजोर पड़ता है, उसी दिन लोकतंत्र की नींव में दरारें पड़ने लगती हैं।
याद रखिए—
कानून का सम्मान भय से नहीं, न्याय के विश्वास से पैदा होता है।
और जहाँ न्याय का तराजू बराबर न दिखे, वहाँ सवाल उठना स्वाभाविक है, अपराध नहीं।
आज का सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या व्यवस्था का उद्देश्य नागरिक को झुकाना है, या उसके विश्वास को मजबूत करना?
क्योंकि लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता का भरोसा है, जनता की खामोशी नहीं।
दासानुदास चेदीराज दास
