45 बाघ ओर 50 लोग 8 माह में मारे जा चुके, सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में ‘स्मिता’ हथिनी की तड़प-तड़पकर मौत सरकारी लापरवाही,जिम्मेदार अफसरों पर कब कसेगा कानून का शिकंजा?
नर्मदापुरम13 अगस्त 2026 (हिन्द संतरी ) मध्य प्रदेश वन विभाग के जिम्मेदार कर्मचारियों की लापरवाही से सुरक्षा में लगी सेंघ के कारण बीते एक साल में 50 लोगों की जाने जा चुकी है वही 8 महीने मे 45 बाघ मारे जा चुके है। 50 मौतों में से 22 लोग बाघों के हमलों में मारे गए. जंगली सूअरों के हमलों में आठ, हाथियों के हमलों में सात और भालुओं के हमलों में चार लोगों की मौत हुई. तेंदुए के हमले में एक व्यक्ति की जान गई. मरने वालों में कम से कम 16 लड़कियां और महिलाएं शामिल हैं, जबकि बाकी मृतक लड़के और पुरुष हैं। यह सब बाघों की बढ़ती संख्या, सिकुड़ते जंगल, टूटते वन्यजीव कॉरिडोर और ग्रामीणों की जंगल पर निर्भरता के कारण बिगड़े हालात चिंताजनक हैं। सबसे ज्यादा स्मिता हथिनी की मौत ने सतपुड़ा टाइगर रिजर्व को कटघरे मे खड़ा किया है जिसमें अन्य जानवरों की मौत के साथ उनके भोजन आदि के लिए आने वाले वजट की बंदरवाट मानी जा रही है जिसकी उच्च स्तरीय जांच से कई चौकने वाले तथ्य सामने आएंगे।
देखा जाये जो नर्मदापुरम जिला मुख्यालय स्थित सतपुड़ा टाइगर कार्यालय से लाखों-करोड़ों रुपये का बजट, भारी-भरकम अमला और मोटी तनख्वाह पाने वाले अफसरों की मौजूदगी के बावजूद यह प्रश्न पशुओं के पालन-पोषण करने वालों में घर कर गया है कि क्या सरकारी लापरवाही किसी बेजुबान राजकीय धरोहर की बलि ले सकती है, जो इस हथिनी की ली है ? यह तीखा और गंभीर सवाल खड़ा हुआ है मध्य प्रदेश के सतपुड़ा टाइगर रिजर्व में, जहाँ रिजर्व की सबसे अनुशासित, प्रशिक्षित और होनहार मादा हाथी ‘स्मिता’ की उपचार के अभाव में तड़प-तड़पकर दर्दनाक मौत हो गई। जंगल महकमे के इतिहास में विभागीय हाथियों के बीच खूनी संघर्ष के बाद समय पर इलाज न मिलने से किसी मादा हाथी की मौत की यह पहली अभूतपूर्व और शर्मनाक घटना मानी जा रही है।
प्राप्त प्रामाणिक जानकारी के अनुसार, 9 अगस्त की रात रिजर्व में तैनात नर हाथी ‘कृष्णा’ ने मादा हाथी ‘स्मिता’ पर हिंसक हमला कर दिया था। अगली सुबह जब महावत हाथियों को वापस लाए, तब स्मिता के शरीर पर गंभीर और प्राणघातक घाव पाए गए। नियमतः नर हाथियों में आक्रामक व्यवहार के लक्षण दिखते ही उन्हें अन्य हाथियों से सुरक्षित दूरी पर रखने (Isolation Protocol) और कड़ी रात्रिकालीन गश्त (Night Patrolling) का सख्त नियम है। इसके बावजूद दोनों हाथियों को असुरक्षित स्थिति में किसके भरोसे छोड़ दिया गया? क्या ड्यूटी पर तैनात मैदानी कर्मचारी और अधिकारी केवल कागजों में गश्त की खानापूर्ति कर शासन से भारी-भरकम वेतन वसूल रहे हैं?
इस पूरे प्रकरण में सबसे ज्यादा आक्रोश पैदा करने वाली बात घटना के बाद की प्रशासनिक अकर्मण्यता है। घायल स्मिता की हालत लगातार बिगड़ती रही, लेकिन रिजर्व के पशु चिकित्सक के शासकीय कार्य से बाहर होने का बहाना बनाकर उसे तड़पने के लिए छोड़ दिया गया। सवाल उठता है कि करोड़ों रुपये के बजट और ‘टाइगर कंजर्वेशन फाउंडेशन’ (TCF) के भारी फंड वाले टाइगर रिजर्व में आपातकालीन चिकित्सा हेतु किसी वैकल्पिक डॉक्टर या त्वरित रिस्पांस टीम की व्यवस्था क्यों नहीं थी? इलाज में बिताए गए अमूल्य घंटे और समय पर प्राथमिक चिकित्सा न मिलना सीधी-सीधी प्रबंधनात्मक आपराधिक उपेक्षा की ओर इशारा करता है।
कानूनी दृष्टिकोण से, हाथी वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-1 (Schedule-I) के तहत सर्वोच्च संरक्षण प्राप्त जीव है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) की मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) के अनुसार किसी भी शेड्यूल-1 जीव की मृत्यु पर निष्पक्ष जांच और पारदर्शी पोस्टमार्टम अनिवार्य है। यदि गश्त लॉग रजिस्टर, M-STrIPES ट्रैकिंग डेटा और मेडिकल रिस्पांस टाइम में हेरफेर या कर्तव्य में उपेक्षा साबित होती है, तो यह मामला वन्यजीव संरक्षण अधिनियम की धारा 39 और 51 के तहत दंडात्मक अपराध की श्रेणी में आता है। इसके अलावा जिम्मेदार कर्मचारियों व अधिकारियों पर ‘सिविल सेवा आचरण नियमों’ के तहत तत्काल विभागीय जांच (DI) बैठाकर निलंबन और बर्खास्तगी का पूर्ण कानूनी आधार बनता है।
यदि आज इस घोर लापरवाही पर कड़ा संज्ञान लेकर दोषियों पर अनुशासनात्मक व दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई, तो भविष्य में रिजर्व के अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा भी इसी तरह खतरे में बनी रहेगी। जनता और पर्यावरण प्रेमियों की मांग है कि मुख्य वन्यजीव संरक्षक (CWLW) और शासन इस पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कराएं, रात्रिकालीन गश्त की फाइलें सार्वजनिक करें और दोषियों पर सख्त कार्रवाई करें, ताकि बेजुबान ‘स्मिता’ की मौत महज़ एक विभागीय फाइलों का हिस्सा बनकर न रह जाए।