इस बार 15 अगस्त के लालकिले से प्रधानमंत्री के भाषण और उसकी शब्दावली के स्तर को लेकर बुध्दीजीवीयों, राजनैतिज्ञों, विश्लेषकों सहित आम लोगों में काफी प्रतिक्रियाएं सुनाई पड़ रही… इस पूरे विवाद को केवल “भाषण अच्छा था या खराब” के पैमाने पर देखना शायद अधूरा होगा। असली सवाल यह है कि 15 अगस्त के लालकिले से प्रधानमंत्री की भाषा और शब्दावली का स्तर क्या होना चाहिए?
15 अगस्त 2026 के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने युवाओं पर काफी जोर दिया—मीडिया रिपोर्टों के अनुसार लगभग 75 मिनट के संबोधन में युवाओं का उल्लेख 50 से अधिक बार हुआ। उन्होंने एआई स्किलिंग, मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग, खेल और विकसित भारत में युवाओं की भूमिका जैसे विषय भी उठाए।
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लेकिन इसी भाषण में “दिमागी नक्सल” शब्द ने पूरे विमर्श की दिशा बदल दी। प्रधानमंत्री ने कहा कि हथियारबंद नक्सलवाद कमजोर हुआ है, लेकिन ऐसी विचारधारा रखने वाले लोग अब भी हिंसा और अशांति पैदा करने के अवसर खोज रहे हैं और उन्हें पहचानकर अलग-थलग करने की जरूरत है।
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यहीं सौरव दास की एक पंक्ति—“PM के बात करने का एक Standard होना चाहिए”—बहस का विषय बन जाती है।
प्रधानमंत्री की भाषा का भी एक Standard होना चाहिए
प्रधानमंत्री का 15 अगस्त का भाषण केवल सरकार का भाषण नहीं होता। वह लालकिले की प्राचीर से पूरे देश को संबोधित करता है। इसलिए उसमें सरकार की उपलब्धियां हों, भविष्य के सपने हों, आलोचनाओं के उत्तर हों—यह सब स्वाभाविक है; लेकिन शब्दों का चयन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
इस बार प्रधानमंत्री ने युवाओं को भाषण का बड़ा केंद्र बनाया। एआई से लेकर शिक्षा, खेल और विकसित भारत तक युवाओं के लिए कई घोषणाएं और संदेश दिए गए। लेकिन “दिमागी नक्सल” जैसे शब्द ने इन तमाम बातों को पीछे धकेल दिया।
सवाल यह नहीं है कि नक्सलवाद का विरोध किया जाना चाहिए या नहीं। निश्चित रूप से हिंसा, आतंक और हथियार के बल पर लोकतंत्र को चुनौती देने वाली किसी भी विचारधारा का विरोध होना चाहिए। सवाल यह है कि क्या स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय अवसर पर असहमति रखने वाले विचारों को समझाने के लिए “दिमागी नक्सल” जैसा राजनीतिक रूप से भारी और अस्पष्ट शब्द सबसे उपयुक्त शब्द है?
प्रधानमंत्री अगर कहते कि देश को ऐसी हर विचारधारा से सावधान रहना होगा जो हिंसा, अराजकता और लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करती है, तो संदेश शायद अधिक व्यापक और कम विवादास्पद होता।
क्योंकि लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि हर असहमति नक्सलवाद नहीं होती और हर सवाल देशविरोध नहीं होता।
युवा सवाल पूछेंगे। सत्ता से भी पूछेंगे। विपक्ष से भी पूछेंगे। विश्वविद्यालय से भी पूछेंगे और समाज से भी। यही लोकतांत्रिक चेतना है। सवाल पूछने वाले हर युवा को संदिग्ध मान लेना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता, बल्कि संवाद की जगह भय पैदा कर सकता है।
सौरव दास की यह टिप्पणी कि “PM के बात करने का एक Standard होना चाहिए”, इसलिए केवल राजनीतिक कटाक्ष मानकर खारिज कर देना आसान रास्ता होगा। इसके भीतर एक गंभीर लोकतांत्रिक प्रश्न छिपा है—जिस पद की भाषा करोड़ों लोग सुनते हैं, उसकी भाषा का स्तर क्या होना चाहिए?
प्रधानमंत्री चाहे जिस दल के हों, उनकी आवाज केवल समर्थकों तक नहीं जाती। उनकी भाषा स्कूल के बच्चे सुनते हैं, विश्वविद्यालय का विद्यार्थी सुनता है, किसान सुनता है, मजदूर सुनता है, सैनिक सुनता है और वह नागरिक भी सुनता है जिसने उन्हें वोट नहीं दिया।
इसलिए प्रधानमंत्री को आलोचना का जवाब देना हो तो जवाब दें, विपक्ष पर हमला करना हो तो राजनीतिक हमला भी करें; लेकिन राष्ट्रीय मंच की गरिमा ऐसी होनी चाहिए कि विरोधी भी भाषण समाप्त होने के बाद उसके विचार पर बहस करे, शब्दों की मर्यादा पर नहीं।
और शायद यही वह बिंदु है जहां सोशल मीडिया की आलोचना को भी समझना चाहिए। सोशल मीडिया पर किसी भाषण की आलोचना होना अपने आप में यह प्रमाण नहीं कि भाषण विफल था। लेकिन यदि किसी एक शब्द ने पूरे भाषण के युवाओं, शिक्षा, रोजगार, तकनीक और विकास जैसे संदेशों को पीछे धकेल दिया, तो सरकार को यह जरूर सोचना चाहिए कि शब्द कभी-कभी पूरे संदेश पर भारी पड़ जाते हैं।
प्रधानमंत्री के पास शब्दों की कमी नहीं है। उनकी राजनीतिक भाषा प्रभावशाली रही है और वे जानते हैं कि कौन-सा शब्द जनमानस में कितनी दूर तक जाता है।
इसलिए उनसे अपेक्षा भी बड़ी है।
प्रधानमंत्री की भाषा में ताकत होनी चाहिए, लेकिन तंज से बड़ी।
उसमें राजनीतिक दृढ़ता होनी चाहिए, लेकिन कटुता से बड़ी।
उसमें विरोध का उत्तर होना चाहिए, लेकिन विरोधी को छोटा करने की जरूरत नहीं।
और सबसे बढ़कर—उसमें भारत के प्रधानमंत्री की गरिमा दिखाई देनी चाहिए, किसी दल के प्रवक्ता की नहीं।
सौरव दास की एक लाइन इसलिए महत्वपूर्ण है कि वह व्यक्ति पर नहीं, पद की भाषा के Standard पर सवाल उठाती है।
और लोकतंत्र में यह सवाल पूछना किसी भी नागरिक का अधिकार है
