प्रभुपाद जी के जन्मोत्सव पर विशेष
प्रभुपाद जी का जन्मदिवस आलेख न बनाकर ऐसा प्रश्न बनता है जो आज के भक्त, समाज और स्वयं हमसे पूछे—“प्रभुपाद चले गए, लेकिन क्या उनका काम हमारे भीतर पहुँचा?”
शहरनामा :
प्रभुपाद का जन्मदिन है… क्या कृष्ण हमारे भीतर भी जन्मे हैं?
प्रभुपाद का जन्मोत्सव : जिस दिन एक व्यक्ति नहीं, एक आंदोलन जन्मा था
आज हम एक ऐसे महापुरुष का जन्मोत्सव मना रहे हैं, जिन्होंने दुनिया को कोई नया धर्म नहीं दिया।
उन्होंने दुनिया को वह याद दिलाया, जिसे दुनिया भूल चुकी थी।
नाम था—अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत स्वामी प्रभुपाद।
1896 में कलकत्ता में जन्मा एक बालक आगे चलकर सत्तर वर्ष की आयु में समुद्र पार करता है। जेब में धन नहीं, साथ में कोई बड़ा संगठन नहीं, पीछे कोई राजनीतिक ताकत नहीं और सामने ऐसी दुनिया, जो कृष्ण के नाम से लगभग अपरिचित थी।
लेकिन उनके पास एक चीज थी—विश्वास।
और वह विश्वास इतना प्रचंड था कि एक वृद्ध संन्यासी अकेला अमेरिका पहुँचा और देखते-देखते कृष्ण का नाम न्यूयॉर्क की सड़कों से लेकर लंदन, पेरिस, मॉस्को और दुनिया के असंख्य देशों तक गूंजने लगा।
यह कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं।
लेकिन प्रभुपाद की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं थी कि उन्होंने मंदिर बनवाए।
उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी—उन्होंने मनुष्य को उसके भीतर छिपे मंदिर की याद दिलाई।
आज प्रश्न यह नहीं है कि हम प्रभुपाद का जन्मोत्सव कितने भव्य तरीके से मनाते हैं।
प्रश्न यह है—
क्या उनके आने से हमारे भीतर कुछ बदला?
हमारे घर में कृष्ण की तस्वीर आ गई,
लेकिन क्या हमारे व्यवहार में कृष्ण आए?
हमारे गले में तुलसी की माला आ गई,
लेकिन क्या हमारी वाणी से कटुता गई?
हमने हरे कृष्ण महामंत्र जपना सीख लिया,
लेकिन क्या हमने दूसरों के दुःख को सुनना सीखा?
हमने प्रभुपाद की किताबें घर में रख लीं,
लेकिन क्या उन किताबों ने हमारे अहंकार को बाहर निकालना शुरू किया?
यहीं से प्रभुपाद का जन्मोत्सव हमारे लिए उत्सव कम और आईना अधिक बन जाता है।
क्योंकि प्रभुपाद केवल यह नहीं कहते थे कि कृष्ण भगवान हैं।
उनका पूरा जीवन कहता था—
यदि कृष्ण भगवान हैं तो फिर हमारा जीवन किसके लिए है?
आज धर्म भी एक सुविधा बनता जा रहा है।
भगवान से हम कहते हैं—
मेरी नौकरी ठीक कर दो,
मेरा व्यापार बढ़ा दो,
मेरे बच्चों को सफल कर दो,
मेरी बीमारी दूर कर दो,
मेरी प्रतिष्ठा बचा लो।
प्रभुपाद शायद हमसे इससे बड़ा प्रश्न पूछते—
“तुम भगवान को क्या देने आए हो?”
यही भक्ति और सौदे के बीच का अंतर है।
भक्ति का अर्थ यह नहीं कि भगवान मेरे जीवन को मेरी इच्छा के अनुसार चला दें।
भक्ति का अर्थ है—
मैं अपने जीवन को भगवान की इच्छा के योग्य बना दूँ।
प्रभुपाद ने संसार को कृष्ण दिया, लेकिन उससे भी अधिक उन्होंने संसार को सेवा का दर्शन दिया।
उन्होंने कहा—मनुष्य केवल खाने, कमाने, भोगने और मर जाने के लिए पैदा नहीं हुआ।
मनुष्य इसलिए पैदा हुआ है कि वह यह जान सके—
“मैं कौन हूँ?”
मैं यह शरीर हूँ या इस शरीर में रहने वाला चेतन तत्व?
मेरी सफलता मेरी संपत्ति है या मेरा चरित्र?
मेरी पहचान मेरा पद है या मेरी चेतना?
और मृत्यु के बाद मेरे बैंक खाते में क्या बचेगा—इससे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि मेरे कर्मों की छाप किसके जीवन पर बची?
शायद इसी कारण प्रभुपाद का जीवन आज भी हमें असहज करता है।
क्योंकि उन्होंने हमें कोई आसान रास्ता नहीं दिया।
उन्होंने कहा—
इंद्रियों के पीछे मत भागो।
लोभ को अपना भगवान मत बनाओ।
मनुष्य को साधन मत समझो।
जीवन को केवल उपभोग मत बनाओ।
अपने भीतर के अहंकार को पहचानो।
और कृष्ण को अपने जीवन का केंद्र बनाओ।
आज उनके जन्मोत्सव पर सबसे बड़ी सजावट फूलों की नहीं होगी।
सबसे बड़ी सजावट तब होगी, जब कोई व्यक्ति अपने भीतर से एक बुराई निकाल देगा।
किसी के प्रति वर्षों की नाराज़गी छोड़ देगा।
किसी गरीब की सहायता करेगा।
अपने भोजन का एक हिस्सा किसी भूखे के लिए रख देगा।
अपने अहंकार के सामने पहली बार सिर झुका देगा।
और रात को अकेले बैठकर स्वयं से पूछेगा—
“प्रभुपाद ने कृष्ण को दुनिया तक पहुँचाया; मैंने अपने हिस्से की दुनिया तक क्या पहुँचाया?”
क्योंकि प्रभुपाद की असली विरासत इमारतें नहीं हैं।
उनकी असली विरासत चेतना है।
उनकी असली स्मृति तस्वीर नहीं है।
उनकी असली स्मृति परिवर्तन है।
और शायद प्रभुपाद के जन्मोत्सव पर इससे अधिक सच्ची श्रद्धांजलि कोई नहीं हो सकती कि हम कृष्ण का नाम केवल होंठों पर नहीं, अपने आचरण में उतारें।
वरना खतरा यह है कि हम हर वर्ष प्रभुपाद का जन्मदिन मनाते रहें…
और प्रभुपाद हमें भीतर से देखते हुए पूछते रहें—
“मैं कृष्ण को तुम्हारे दरवाजे तक ले आया था…
तुमने उन्हें अपने हृदय तक पहुँचने क्यों नहीं दिया?”
यही प्रश्न आज के जन्मोत्सव का सबसे बड़ा प्रसाद है।
और शायद—
प्रभुपाद को याद करने का सबसे कठिन, सबसे सच्चा और सबसे अछूता तरीका भी।
दासानुदास चेदीराज दास
