कर्म सदैव अकर्म अथवा निष्क्रियता से श्रेष्ठ है—यह बात आध्यात्मिक जीवन के एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत को सामने रखती है। मनुष्य कर्म किए बिना रह ही नहीं सकता। शरीर स्थिर बैठ जाए, तब भी मन विचार करता रहता है, इच्छाएँ उठती रहती हैं और भीतर कर्म चलता रहता है। इसलिए केवल बाहरी रूप से कुछ न करना ही निष्कर्मता या मुक्ति नहीं है।
भगवद्गीता का संदेश है—कर्म से भागना नहीं, कर्म को शुद्ध करना सीखो।
निष्क्रिय मनुष्य यह सोच सकता है कि उसने कोई कर्म नहीं किया, इसलिए वह कर्मफल से भी बच गया। लेकिन जीवन में अपनी जिम्मेदारियों से पलायन भी एक प्रकार का कर्म ही है। माता-पिता का कर्तव्य छोड़ देना, समाज के प्रति उत्तरदायित्व से मुँह मोड़ लेना, अन्याय देखकर मौन रह जाना—ये सब बाहरी रूप से “कुछ न करना” दिखाई दे सकते हैं, लेकिन इनके भी परिणाम होते हैं।
इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि कर्म करें या न करें, बल्कि प्रश्न यह है कि कर्म किस भावना से करें।
यदि कर्म केवल स्वार्थ, अहंकार, लोभ और इंद्रिय-सुख के लिए किया जाए तो वही कर्म मनुष्य को बाँधता है। लेकिन वही कर्म यदि कर्तव्य-बोध, सेवा, करुणा और परमात्मा को समर्पित भाव से किया जाए तो कर्म धीरे-धीरे साधना बन जाता है।
एक माँ अपने बच्चे की सेवा करती है—यह केवल घरेलू कार्य नहीं, प्रेम की साधना बन सकता है।
एक किसान खेत में श्रम करता है—यह केवल रोज़गार नहीं, अन्नदाता का धर्म है।
एक चिकित्सक रोगी की सेवा करता है—यह केवल पेशा नहीं, करुणा का कर्म हो सकता है।
और एक भक्त भगवान का नाम जपते हुए अपने दैनिक कर्तव्यों को निभाता है—तो उसका पूरा जीवन ही भक्ति का माध्यम बन सकता है।
कर्म की श्रेष्ठता उसके आकार में नहीं, उसकी भावना में होती है।
गीता का कर्मयोग इसी रहस्य को समझाता है—कर्म करो, लेकिन कर्म के फल के अहंकार और आसक्ति में मत बंधो। सफलता मिले तो अहंकार न हो, असफलता मिले तो निराशा न हो। अपने हिस्से का कर्तव्य ईमानदारी से करो और परिणाम को परमात्मा पर छोड़ दो।
यह अवस्था पलायन नहीं, बल्कि समर्पण है।
वास्तविक अकर्मण्यता यह नहीं कि शरीर शांत बैठा है; वास्तविक अकर्मण्यता तब है जब मनुष्य अपने कर्तव्य को जानते हुए भी केवल भय, आलस्य या स्वार्थ के कारण उससे पीछे हट जाए।
और वास्तविक कर्मयोग यह है कि मनुष्य कर्म के बीच रहते हुए भी भीतर से शांत रहे।
हाथ संसार के कर्म में हों, लेकिन हृदय परमात्मा में हो।
कर्तव्य संसार के लिए हो, लेकिन अहंकार रहित हो।
प्रयास हमारा हो, लेकिन परिणाम का अभिमान हमारा न हो।
यही कर्म को बंधन से साधना में बदल देता है।
अंततः मनुष्य को संसार छोड़कर आध्यात्मिक नहीं बनना है; उसे संसार में रहते हुए अपनी चेतना को शुद्ध करना है।
क्योंकि—
कर्म से भागकर मनुष्य अपने कर्तव्य से बच सकता है, लेकिन अपने मन से नहीं।
कर्म को भगवान को समर्पित करके मनुष्य संसार में रहते हुए भी भीतर से मुक्त हो सकता है।
यही कर्मयोग का सार है—
कर्म करो, कर्तव्य निभाओ, सेवा करो, लेकिन फल और अहंकार की जंजीरों में स्वयं को मत बाँधो।
दासानुदास चेदीराज दास
