आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
भारतीय संस्कृति के मूलाधार वेद-पुराण ओर शास्त्र है जिसके रहस्यमय ज्ञान को हम ओर हमारा समाज हृदयंगम नहीं कर सका है, परिणामस्वरूप वह विलुप्तप्राय होता जा रहा है ओर हम अर्थ ओर काम के मार्गगामी हो धर्म ओर मोक्ष की राह भूल गए है। धर्म ओर मोक्ष का मार्ग हमारे परमार्थ का मार्ग है जंहा शारीरिक एवं मानसिक व्याधियों से मुक्ति से परम शांति ओर कल्याण ही नही अपितु जन्म मरण का चक्र समाप्त हो परमात्मा का निज धाम प्राप्त होता है। श्रीवामनपुराण के सोलहवे अध्याय में चातुर्मास व्रत अनुष्ठान का वर्णन है जहा इस व्रत को सभी वर्ग, सभी वर्ण के हरेक व्यक्ति के लिए करने का उल्लेख है जिसवे व्रत के माध्यम से वे स्वस्थ शरीर के साथ ही मन] बुद्धि] चित्त और अहंकार आदि की परिशुद्धि सहज ही पा जाते है। कुछ लोग कहते हैं कि यह व्रत संन्यासियों के लिये ही है] इसलिए सनातन धर्म के सभी साधु,सन्यासी, साधक ऋषि मुनि आदि सभी देवशयन के बाद देवउठनी तक की 4 मास की अवधि तक एक स्थान पर ठहर कर अपना अनुष्ठान पूरा करते है ,जबकि इस व्रत को ब्रह्मचारी] गृहस्थ] वानप्रस्थी और संन्यासी मिलकर या पृथक पृथक अनुष्ठान कर सकते है।
देवशयनी एकादशी का वह समय जब आषाढ़ी पूर्णिमा शुक्लपक्ष में सूर्य के मिथुनराशि में चले जाने पर एकादसी तिथि के दिन जगदीश्वर विष्णुजी शय्या पर जाते है तब सूर्य उत्तरायण होते है तब लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु भोगियोग (शेषशय्या) पर सो जाते हैं। उन विष्णु के सो जाने पर देवता, गंधर्व एवं देवमाताएँ भी क्रमशः सोते हैं-प्रतिसुप्ते विधी तस्मिन् देवगन्धर्वगुष्ठाकाः। देवानां मातरश्चापि प्रसुप्ताचाप्यनुक्रमात् ॥ इसके बाद त्रयोदशी तिथि में सुगन्धित कदम्ब के पुष्पों से बनी पवित्र शय्या पर कामदेव शयन करते हैं। फिर चतुर्दशी को सुशील स्वर्णपङ्कज से निर्मित सुखदायक रूप में बिछाये गये तकियेवाली शय्यापर यक्ष लोग शयन करते हैं। पूर्णमासी तिथि को चर्म वस्त्र धारण कर उमानाथ शंकर एक-दूसरे चर्मद्वारा जटाभार बाँधकर व्याघ्र चर्म की शय्यापर सोते हैं। ब्रह्माजी (श्रावण कृष्ण) प्रतिपदा को नीलकमल की शय्यापर सो जाते हैं। विश्वकर्मा द्वितीया को, पार्वतीजी तृतीया को, गणेशजी चतुर्थी को, धर्मराज पञ्चमी को, कार्तिकेयजी षष्ठी को, सूर्य भगवान् सप्तमी को, दुर्गादेवी अष्टमी को,लक्ष्मीजी नवमी को, वायु पीने वाले श्रेष्ठ सर्प दशमी को और साध्यगण कृष्णपक्ष की एकादशीको सो जाते हैं। उसके बाद जब सूर्य कर्क राशि में गमन करते हैं तब देवताओं के लिये रात्रिस्वरूप दक्षिणायन का आरम्भ हो जाता है ओर देवों के सो जानेपर वर्षाकाल का आगमन हो जाता है।
चातुर्मास व्रत न करने वालों के लिए यह अवसर खोना जीवन में धर्म ओर मोक्ष को विस्मरण कर गहरी क्षति उठाना है। महाभारत में उल्लेख मिलता है कि जो इस चातुर्मास्य व्रत का अनुष्ठान नहीं करेगा उसका सम्पूर्ण वर्ष ही पापयुक्त हो जायगा । वार्षिकान् चतुरो मासान् वाहयेत् केनचिन्नरः। व्रतेन नो चेदाप्नोति किल्विषं तत्सरोद्भतम्।। ये चारों मास श्रावण] भाद्रपद] आश्विन]और कार्त्तिक- वर्षाकाल के रूप में प्रसिद्ध है, अतः इसे वर्षर्तुव्रत यानी वर्षा ऋतु का व्रत भी कहा जाता है। यह व्रत आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की एकादशी द्वादशी या पूर्णिमा से प्रारम्भ किया जाता है अथवा सौरमासानुसार कर्कसंक्रान्ति से भी इसके आरम्भ का विधान है। संन्यासियों के चातुर्मास व्रत विधान के कुछ विशेष नियम हैं जिसमें साधक-संन्यासी आषाढ़ पूर्णिमा को क्षौर यानी मुण्डन कराके व्रत को आरम्भ करे। व्रत की समाप्ति तक मध्य में क्षौर न कराये । किसी भी नदी, पर्वत आदि को पार न करे तथा एक कोश से अधिक यात्रा न करे आदि –आषाढ्यां पौर्णमास्यां तु तपनं कारयेद्यतिः। तेषु मासेषु केशादीन्नुतुसन्धौ न वापयेत्।। नदीश्च न तरेत्तेषु क्रोशादूर्ध्वं न च व्रजेत्।। प्राणिमात्र के कल्याण की कामना से संन्यासी यह संकल्प ले कि लोककल्याणार्थ ही भगवान् श्रीमन्नारायण शेषशय्या पर चार मास तक शयन करेंगे तब तक मैं भी एक स्थान में ही निवास करूँगा।
शास्त्रों ने इस व्रत के लिये अन्य पक्ष भी प्रस्तुत किये हैं ओर इस व्रत को ग्रहण करने के चार प्रकार बताये गये हैं जैसे- श्रावण से कार्तिक] भाद्रपद से कार्तिक] आश्विन से कार्तिक अथवा तुला संक्रान्ति से कार्तिक शुक्ला द्वादशी पर्यन्त। चतुर्धा ग्राह्य वै चीण चातुर्मास्यव्रतं नरः। कार्त्तिके शुक्लपक्षे तु द्वादश्यां तत्समापयेत्।। वर्तमान में अधिकतम सनातन धर्मावलम्बियों में इस चातुर्मास्य व्रत को दो मास- श्रावण और भाद्रपद में ही रखने की परम्परा बन गई है। चातुर्मास्य व्रत अनुष्ठान कर्कसंक्रान्ति से लेकर तुला संक्रान्ति तक कभी भी ग्रहण किया जा सकता है। यह विधान उनके लिये है जो पूरे चार मास तक व्रत में नहीं रहना चाहते। परन्तु इन चार मासों में कभी भी व्रत प्रारम्भ किया जाय तो भी कार्त्तिक शुक्लपक्ष की उत्थान द्वादशी को ही इसका समापन करना चाहिये। कदाचित् कार्तिक में अधिकमास की प्रवृत्ति हो जाय तो इसे शुद्ध द्वितीय कार्त्तिक शुक्ला द्वादशी में समाप्त करना चाहिए। इस व्रत करने वाले का आचरण सर्वथा शुद्ध होना चाहिए ओर वह उपवास करते समय निंद्रा में न जाकर पूरे समय श्रीमन्नारायण भगवान् का ध्यान] स्तोत्र और सर्वोपचार पूजा आदि से विधिवत् आराधना करे ओर लौकिक कार्यों को कम करके ब्रह्मचर्य के नियमों का पूर्ण पालन करें। साधक को राग] द्वेष और मिथ्या सम्भाषणादि असत् कृत्यों का परित्याग कर देना चाहिये । व्रतदीक्षा के अनुसार ही व्रती की वेश-भूषा और रहन-सहन का विधान है। व्रती को मनसा] वाचा] कर्मणा हिंसा मात्र का परित्याग कर देना चाहिये । शास्त्र ने जिस आहार का निषेध किया है] उसका परित्याग अनिवार्य रूप से करना चाहिये।
चातुर्मास की अवधि में देखा जाये तो इन मासों में श्रावण से कार्त्तिक पर्यन्त व्रत-त्योहार ही भरे पड़े हैं। इन व्रत-त्योहारों में विशिष्ट कर्मकाण्डीय उपचारों से भगवदाराधन के द्वारा विविध प्रकार से शरीर, अन्तःकरण और वातावरण आदि की शुद्धि करनी ही चाहिये। इन चार मासों में वर्षा और शरत् के प्रभाव से अनेक तरह के भयानक रोगों का आक्रमण भी सहजता से हो जाया करता है। इनसे बचने के लिये ही इन चार मासों में शास्त्रों ने सबसे अधिक हितकर व्रत-अनुष्ठानों का विधान बताया है। जिनका सम्पादन अनिवार्यरूपेण करना ही चाहिये। इन मासों में गोसेवा की दृढता का संकल्प सब प्रकार से कल्याणकारी होता है। प्रकृति और पृथिवी आदि भी इन चार मासों में गोसेवार्थ विशेष रूप से नियुक्त होती हैं। ये इन्हीं चार मासों में गोवंश की परिपुष्टता के लिये सर्वाधिक घास-चारे और वत्स तक की व्यवस्था करती हैं। इस समय प्रकृति और पृथ्वी आदि की सेवा से परिपुष्ट होकर सभी भाग्यवानों को गोसेवा का दृढतम संकल्प लेकर चातुर्मास का व्रत अनुष्ठान सम्पन्न करना चाहिए, यही सभी गृहस्थ ओर साधक साधुओं के द्वारा करना कल्याणकारी साबित होगा ।
आत्माराम यादव पीव वरिष्ठ पत्रकार
श्रीजगन्नाथधाम काली मंदिर के पीछे, ग्वालटोली
नर्मदापुरम मध्यप्रदेश मोबाइल 9993376616
