“शहरनामा”
आपको यह शक्ति किसने दी..?
आपको लगता है कि आप बहुत शक्तिशाली हैं..?
कभी अपने भीतर झांककर देखिए।
जिस शरीर को आप अपना कहते हैं, वह आज स्वस्थ है तो कल बीमार भी पड़ सकता है।
जिस मन पर आपको इतना भरोसा है, वह कभी-कभी छोटी-सी परेशानी में भी घबरा जाता है।
जिस बुद्धि के बल पर आप बड़े-बड़े निर्णय लेते हैं, वह भी कभी भ्रमित हो जाती है।
फिर भी आप कठिन परिस्थितियों का सामना करते हैं।
आखिर यह शक्ति आती कहां से है?
तनिक विचार कीजिए।
जब सब कुछ आपके विरुद्ध होता है, तब भी भीतर से कोई कहता है—“उठो, अभी हारना नहीं है।”
जब रास्ते बंद दिखाई देते हैं, तब कोई आशा जगती है—“कोई रास्ता जरूर निकलेगा।”
जब अपने भी साथ छोड़ देते हैं, तब भी मनुष्य किसी अदृश्य भरोसे के सहारे खड़ा रहता है।
यह भरोसा किसने दिया आपको..?
हम अक्सर अपनी सफलता का श्रेय स्वयं को देते हैं। कहते हैं—“मैंने मेहनत की, मैंने संघर्ष किया, मैंने यह मुकाम हासिल किया।”
मेहनत आपकी थी, संघर्ष आपका था, लेकिन जिस शरीर ने मेहनत की, जिस बुद्धि ने रास्ता खोजा और जिस हृदय ने हार नहीं मानी—उनकी शक्ति का स्रोत क्या आप स्वयं हैं…?
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
“मत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च।”
अर्थात् स्मृति, ज्ञान और विस्मरण भी मुझसे ही आते हैं।
तो फिर अपनी शक्ति पर इतना अहंकार क्यों..?
जिसने शक्ति दी, उसे भूलकर शक्ति का प्रदर्शन करना आध्यात्मिक विस्मृति है।
इसका अर्थ यह नहीं कि आप प्रयास करना छोड़ दें। बल्कि इसका अर्थ है कि प्रयास करते समय अहंकार छोड़ दें।
कठिनाई आए तो घबराइए नहीं।
असफलता मिले तो टूटिए नहीं।
लोग विरोध करें तो अपने कर्तव्य से पीछे मत हटिए।
लेकिन एक बात याद रखिए—
लक्ष्य केवल धन, पद और प्रतिष्ठा का नहीं होना चाहिए।
क्योंकि मनुष्य संसार जीतकर भी स्वयं से हार सकता है।
धन मिल गया, लेकिन शांति नहीं मिली।
सम्मान मिल गया, लेकिन विनम्रता नहीं आई।
सफलता मिल गई, लेकिन भगवान का स्मरण छूट गया।
तो फिर यह कैसी विजय..?
सच्ची विजय वह है जिसमें बाहर की परिस्थितियां बदलें या न बदलें, भीतर का मनुष्य बेहतर बनता जाए
इसलिए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते रहिए।
थक जाएं तो विश्राम कर लीजिए, लेकिन निराश होकर बैठ मत जाइए।
गिर जाएं तो उठ जाइए, लेकिन गिरने को अपनी पहचान मत बना लीजिए।
गलती हो जाए तो सीख लीजिए, लेकिन अपने जीवन का उद्देश्य मत भूलिए।
और जब कभी मन कहे—“अब मुझसे नहीं होगा”, तब स्वयं से पूछिए—
“अब तक जो शक्ति मुझे यहां तक लाई, वह किसकी थी…?”
शायद यही प्रश्न आपको फिर खड़ा कर दे।
क्योंकि भक्त का विश्वास यह नहीं कि उसके जीवन में कठिनाइयां कभी आएंगी ही नहीं।
उसका विश्वास यह है—
“कठिनाइयां आएंगी, लेकिन मैं अकेला नहीं हूं।”
इसलिए लक्ष्य प्राप्त करके ही रुकिए।
लेकिन लक्ष्य प्राप्ति के बाद भी यह मत भूलिए कि शक्ति आपकी नहीं थी।
जिसने शक्ति दी, उसी को धन्यवाद दीजिए।
जिसने बुद्धि दी, उसी का स्मरण कीजिए।
जिसने जीवन दिया, उसी के चरणों में जीवन समर्पित कीजिए।
क्योंकि मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि उसने कितनी ऊंचाई प्राप्त की, बल्कि यह है कि ऊंचाई पर पहुंचकर भी वह अपने वास्तविक आधार को नहीं भूला।
दासानुदास चेदीराज दास
