गणेश चतुर्थी पर विशेष लेख- आत्माराम यादव चीफ एडिटर
सनातन धर्म में भगवान गणेश प्रथम पूज्य है ओर हर सनातनी हिन्दू ही नहीं अन्य जाति वर्ग के लोग पूरी दुनिया में पूजा पाठ साधना आदि की शुरुआत गणेश जी का संकल्प लेकर करते है। ‘गणेश’ कई नामों से जाने जाते हैं, यथा कोई उनके 12 नामों का जाप करता है, कोई बत्तीस नाम तो कोई 108 नामों का नित्य पाठ कर उन से रिद्धि सिद्धि की कामना करते है। व्यास गद्दी से भागवताचार्य हो या धर्म तीर्थों अथवा आवास आदि स्थान हो, सभी जगह सभी स्थानों पर आदिकाल से आचार्य गण गणपति, विनायक, लम्बोदर आदि की सबसे पहले पूजा करते आ रहे है, आज यही हमारी परम्परा का मुख्य अंग हो गया है। गणेश शिव पार्वती के पुत्र कहे गए है। 33 कोटि अर्थात 33 प्रकार के सभी देव ब्रम्हा, विष्णु, शिव से लेकर राम कृष्ण सभी अवतारों एवं 9 देवियों की पूजा आराधना आदि गणेश के नाम से ही प्रारम्भ होती है तथा 16 संस्कारों के कोई भी मांगलिक उत्सव हो अथवा भूमि पूजन, निर्माण गृह निर्माण अथवा गृह प्रवेश सभी गणेश पूजा के बिना शुरू नहीं किए जा सकते है।
भगवान गणेश गणपति के संबंध में कथा है कि एक बार, भगवान शिव की पत्नी ने, एकांत के पलों में, आटे का एक बहुत ही सुंदर बालक बनाया ओर उसके प्राण दे दिये। प्राणों की प्रतिष्ठा के बाद वह जीवित हो उठा। उनको यह बालक बहुत प्रिय था जिसे वे बहुत स्नेह करती थीं। एक बार उस बालक को पहरे पर बिठाकर उसे आदेश दे दिया की किसी को भीतर नहीं आने देना, आदेश दे वे स्वयं अपने स्नानगृह में थीं। माता की आज्ञा का, बालक पालन करने लगा। उसी समय महा शिव पधारे। बालक ने उनको भीतर जाने को मना कर दिया। कथा है कि शंकर ने त्रिशूल से उस बालक का सिर उड़ा दिया। “शिव” पत्नी को पता चला, तो वे अत्यधिक पीड़ित हो उठीं। उन्होंने कहा, “आपने यह क्या कर दिया? मैंने ही इस पुत्र को प्रकट किया है। आप अपने ही पुत्र के हत्यारे हो गये हैं।” शंकर ने गणों को चारों ओर भेजा। परन्तु सिर का कहीं पता न चला। शिव ने कहा उत्तर की ओर मुंह किये, जो तपस्या में उत्तरायण है, ऐसे किसी शीश को वे ले आयें। कथा इस प्रकार है कि ऐरावत का पुत्र, जो कहीं उत्तर की और मुंह करके तपस्या कर रहा था, दक्षिण की ओर उसका पृष्ठ भाग था। गण, उसी का सिर काट कर ले आये और उस सिर को ही उन्होंने उस बालक के धड़ के साथ महा शिव ने जोड़ दिया। इस प्रकार भगवान-विनायक, जिनका सिर हाथी का है -वे गणपति कहलाये। ज्ञान की अमृतमयी धाराएं, जो भी इस धरा पर अवतरित हुई और आज भी जो हमारे पास चारों वेद आदि अमृतमय ग्रन्थ हैं, उन्हें भगवान गणेश ने ही हम तक देववाणी संस्कृत सहित देवनागरी लिपि में प्रेषित किया है।
जगत में कोई भी भाषा हो, कोई भी बोली हो वह प्रकृति से उत्पन्न है। प्रकृति के प्रतीकों से हटके हमारी कोई भाषा नहीं, कोई अभिव्यक्ति नहीं। जीव मात्र की भाषा, प्रतीकात्मक भाषा ही, उसकी भाषा है। चाहे उस भाषा की लिपि कोई भी हो। प्रतीकों के द्वारा ही हम सोचते हैं, समझते हैं, सुनते हैं, बताते हैं। इसलिए, आदिकाल से चली आ रही भारतीय संस्कृति की यह महान परम्परा है। वेद हों, श्रुतियां हों, ब्राह्मण “आरण्यक” ग्रन्थ हों, उपनिषद् हों, पुराणों की कथा आदि, मानस के गीता हो या कृष्ण की कहानी हो बात, प्रतीकात्मक भाषा में ही कही जाती है। गणपति भी, हमारे अराध्य देव भी, प्रतीकात्मक भाषा में हमें अद्भुत उपदेश करते हैं। गणपति को हाथी का शीश मिला ओर धड़ मनुष्य की इन विविधताओं के मायने समझने होंगे। गणेश जिसमें हाथी की मस्ती नहीं, किन्तु बौद्धिक परिपक्वता से परिपूर्ण स्थिति-प्रज्ञ, बुद्धिमता, भगवान विनायक इन गुणों से संपन्न तभी उनकी प्रथम पूजा की सार्थकता सिद्ध होती है। यह संसार दुखों की खान है। आप सबको चिन्तायें सताती है। पीड़ा, भय, आतंक, अनिश्चितता के क्षण, इसका दुख, उसकी पीड़ा। थोड़ा सा हम, इसी बात पर विचार करें, और फिर भगवान विनायक को सामने रखें तो शायद हम यह बात अच्छी तरह से समझ जाएँगे।
भगवान गणपति के दोनों ओर रिद्धि और सिद्धि खड़ी है। रिद्धि और सिद्धि का अर्थ है- उपलब्धियां ! भौतिक, सामाजिक, ऐश्वर्य । वही तो रिद्धियां और सिद्धियां हैं। जब मस्तिष्य में देह में गणपति वास करें तभी मेरे दायें और बायें रिद्धियां और सिद्धियां हों। बौद्धिक परिपक्वता, ही हमारे सुखद जीवन का रहस्य है। गणपति का जो मुख मण्डल है वह जीवन को अमृतमय बनाने के लिए हर ओर से उपदेशात्मक है। भगवान विनायक, एक दन्त है। अर्थात् एकाग्र, एक लक्ष्य है। जिसके जीवन में एकाग्रता नहीं, वह किस गन्तव्य को जायेगा ? किस लक्ष्य को प्राप्त करेगा? यह विचारणीय है। इसे समझने के लिए आज के युग की स्थिति, परिस्थिति ओर हालातों को समझ रखकर ही निर्णय पर पहुंचा जा सकता है। उदाहरण के लिए अगर कोई धारदार चाकू या भरी हुई रिवाल्वर किसी छोटे बच्चे या बदमाश गुंडे अपराधी के हाथों आ जाये तब के निर्मित हालात ओर उससे होने वाले दुखद परिणामों का भय सभी को आतंकित करेगा, किन्तु अगर यही शस्त्र किसी सुरक्षाकर्मी,कोतवाल-थानेदार के हाथ में हो तो भरी हुई रिवाल्वर देखकर समाज भयभीत नही होगा ओर न ही आतंकित होगा। बालक के निर्दोष हाथों में शस्त्र होने पर वह अबोध खुदको इनसे अपने प्राणो को क्षति न पहुचाए इसकी चिंता घर परिवार को होगी। गुंडा बदमाश समाज के किसी भी व्यक्ति के प्राण न ले ले इसे लेकर समाज चिंतित होगा। किन्तु इन दोनों ही मामलों में भय ओर आतंक का दायरा बंटा होता है, बच्चे के मसले पर घर परिवार भयभीत ओर डरा होता है अगर बालक अपने हाथ के शस्त्र का अज्ञानता के कारण प्रयोग करे तो खुद अथवा परिजन उसके दायरे में होंगे जबकि बदमाश के मामले मे वह जहा जिस जगह खड़ा होगा वहाँ का व्यक्ति ओर निवासी डरे ओर आतंकित होंगे। जबकि पुलिस अधिकारी पर सभी की सुरक्षा का दायित्व होता है ओर वह भरा हुआ रिवाल्वर लेकर निकले तो गुंडे बदमाशों की शामत आती है ओर जनता परिपक्व ओर जिम्मेदार हाथों में शस्त्र होने से सुखी ओर सुरक्षा की दृष्टि के निश्चिंतता में होगी।
गणपति के दोनों ओर विराजित रिद्धि और सिद्धि को भरी पिस्तौल की तरह जाने तो यह स्पष्ट होगा कि जब जिम्मेदार ओर परिपक्व बौधिक स्तर के हाथों में रिद्धि सिद्धि हो तो प्राणी मात्र की सुरक्षा के साथ समर्पित सेवा में वही भौतिकता की भांति सबका कल्याण करेंगी। यही रिद्धि सिद्धि अगर भौतिकता, या धन आदि के रूप में अपरिपक्व हाथों में आ जाए तो भाई-भाई में कौर्ट कचहरी मुकदमेवाजी होगी। घर परिवार बिखरेंगे उजड़ेंगे ! सगे भाई, एक दूसरे के खून के प्यासे होंगे! क्योंकि, उन्होंने अपने जीवन में रिद्धि और सिद्धि का आवाहन तो किया किन्तु उनके प्राप्त होने पर गणपति को अपने जीवन में उतार न पाये। इसीलिए गणपति को अपने जीवन में स्थान देने के लिए लोगों मे प्रतिस्पर्धा चरम पर है इसलिए वे चाहते है की गणपति सबसे पहले उनके पास आए। पूजा और भक्ति में, हर व्यक्ति भक्त बना गणपति से प्रार्थना करता है कि हे गणपति ! हम आप ही का अपने इस देहरूपी देवालय में आवाहन कर रहे है , आप हमारे मस्तिष्क पर, बुद्धि में, मन में पधारें। जिससे ये रिद्धि और सिद्धि हमारा कल्याण करें, ओर हमारी कोई भी चूक कहीं हमारे विनाश का कारण न बने। हे गणपति आप हमारे बौद्धिक धरातल पर विराजमान हों तभी ये रिद्धियां और सिद्धियां हमारे दायें व बायें प्रकट हों हमें सन्मार्ग पर ले चले! इसलिए सर्वप्रथम में आप ही की पूजा करता हूँ।
गणपति का श्रीमुख चमत्कारिक ओर विलक्षण है। हाथी की जीभ भीतर को घूमती है। अन्तर्मुखी होती है। यह जीवन का बीज मंत्र है। हम वाणी का प्रयोग सिर्फ बाहर के लिये करते हैं। यदि सत्संग सुनते हैं, कथाएं पढ़ते हैं, तो गली चौराहों पर दूसरों को उपदेश दिया करते हैं। हमारी वाणी सदा बहिर्मुखी होती है। जबकि वाणी माँ सरस्वती का दूसरा नाम है। हम वाणी को, जिव्हा को, केवल बाहर ही रखते हैं, भीतर नहीं आने देते हैं। जबकि हाथी अपनी जीभ को भीतर रखता है। जिस दिन हम अपना दोष देखना शुरू कर देंगे जीभ भीतर को चली जाएगी , पर यह इतना आसान नहीं है। हाथी की जीभ सदा अंतर्मुखी होती है, भीतर को घूमती है। आज हमे ओर आपको विनायक कि कृपा कि आवश्यकता है ताकि उनकी कृपा हो जाए तो हमारी भी जिव्हा अंदर कि ओर चलने लगे तो हम देश के जो हालात है,उसको ठीक करने हेतु सनातन सत्य कि ज्वालाओं से जनमत को उर्द्धगामी सोच के साथ भय ओर आतंक से मुक्ति दिलाने आगे बढ़ सके। हमारी अंतर्मुखी हुई जिव्हा से निकले सत्य ज्योति बनकर ऊपर उठे। हम इस अमृतमय ज्ञान को, जिहा के द्वारा भीतर ले जायें। पियें और गणपति की उस व्यापकता को अपने जीवन में उतार पायें। हम ऐसे अद्भुत सौभाग्य को भगवान विनायक कि कृपा से प्राप्त करें। भगवान गणपति भारत के हर सनातनी के साथ हों, समस्त देशवासियों पर उनकी करुणा हो उनकी कृपा हो।
