शरीर बदलता है, जीवात्मा नहीं…?
जरा अपने जीवन की ओर पीछे मुड़कर देखिए।
कभी आप बच्चे थे। वह बचपन का शरीर आज कहाँ है? वह चेहरा, वह कद, वह शरीर, वह शक्ति—सब बदल गया। फिर वही बच्चा युवा हुआ। शरीर में बल आया, चेहरे पर एक अलग चमक आई, इच्छाएँ बदलीं, विचार बदले। फिर धीरे-धीरे युवावस्था भी पीछे छूट गई और वृद्धावस्था सामने आ गई।
लेकिन इस पूरे परिवर्तन में एक प्रश्न बहुत गहरा है—
जो बच्चा अपने बचपन को याद कर रहा है, वह कौन है?
बचपन का शरीर तो अब नहीं है। युवावस्था का शरीर भी स्थायी नहीं रहा। शरीर की असंख्य कोशिकाएँ बदलती रहती हैं, चेहरा बदलता है, बाल बदलते हैं, त्वचा बदलती है, शरीर की शक्ति बदलती है। फिर भी मनुष्य कहता है—
“मैं वही हूँ जो बचपन में था।”
यही “मैं” वास्तव में विचार करने का विषय है।
शरीर बदलता रहा, लेकिन भीतर से “मैं” होने की अनुभूति बनी रही। इसका अर्थ है कि शरीर और शरीर का स्वामी एक नहीं हैं।
भगवद्गीता इसी सत्य को अत्यंत सरल ढंग से समझाती है—
“देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।”
अर्थात इस शरीर में रहने वाला जीव जिस प्रकार बाल्यावस्था से युवावस्था और युवावस्था से वृद्धावस्था को प्राप्त होता है, उसी प्रकार मृत्यु के समय वह एक शरीर छोड़कर दूसरे शरीर को प्राप्त होता है।
यहाँ श्रीकृष्ण हमें केवल मृत्यु के बाद की बात नहीं बता रहे हैं। वे पहले हमारे सामने प्रत्यक्ष प्रमाण रख रहे हैं।
तुम्हारे सामने तुम्हारा अपना जीवन प्रमाण बनकर खड़ा है।
तुम्हारा शरीर बदल चुका है, लेकिन तुम्हारा अस्तित्व समाप्त नहीं हुआ।
इसलिए मृत्यु को समझने से पहले जीवन को समझना आवश्यक है।
हम अक्सर कहते हैं—“मैं बूढ़ा हो गया।”
लेकिन थोड़ा गहराई से सोचिए।
क्या वास्तव में “मैं” बूढ़ा हुआ हूँ, या मेरा शरीर बूढ़ा हुआ है?
हम कहते हैं—“मेरा शरीर।”
जिस क्षण हम कहते हैं “मेरा शरीर,” उसी क्षण दो अस्तित्व अलग हो जाते हैं—एक शरीर और दूसरा उसका स्वामी।
हम यह नहीं कहते कि “मैं शरीर हूँ, इसलिए शरीर मेरा है।” हम सहज रूप से कहते हैं—“यह मेरा शरीर है।”
जैसे हम कहते हैं—“यह मेरा घर है”, “यह मेरी गाड़ी है”, “यह मेरे कपड़े हैं।”
घर हम नहीं हैं। गाड़ी हम नहीं हैं। कपड़े हम नहीं हैं।
उसी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से शरीर भी हम नहीं हैं।
शरीर हमारा माध्यम है, हमारा वस्त्र है, जिसके माध्यम से जीवात्मा इस संसार में अपने कर्मों का अनुभव करती है।
बचपन में शरीर छोटा था, लेकिन “मैं” वही था।
युवावस्था में शरीर बदल गया, लेकिन “मैं” वही रहा।
वृद्धावस्था में शरीर कमजोर हो गया, फिर भी भीतर से “मैं” की अनुभूति बनी रही।
तो फिर मृत्यु क्या है?
मृत्यु का अर्थ यह नहीं कि “मैं” समाप्त हो गया।
मृत्यु का अर्थ है—जिस शरीर के साथ मेरी पहचान बन गई थी, उस शरीर का अंत हो गया।
यही कारण है कि आध्यात्मिक ज्ञान मनुष्य को मृत्यु के भय से ऊपर उठने का मार्ग दिखाता है।
हमारा सबसे बड़ा भ्रम यही है कि हमने शरीर को ही अपना सम्पूर्ण अस्तित्व मान लिया है।
इसलिए शरीर का सौंदर्य हमारा सौंदर्य बन जाता है, शरीर की बीमारी हमारी पहचान बन जाती है, शरीर की वृद्धावस्था हमारा भय बन जाती है और शरीर की मृत्यु हमें अपना अंत दिखाई देती है।
लेकिन यदि मैं शरीर से भिन्न हूँ, तो शरीर का परिवर्तन मेरे अस्तित्व का परिवर्तन नहीं है।
यह बात केवल दर्शन नहीं है। इसे हम प्रतिदिन अनुभव करते हैं।
हर रात हम सोते हैं। जाग्रत अवस्था में संसार दिखाई देता है। स्वप्न में दूसरा संसार दिखाई देता है। गहरी नींद में बाहरी संसार का बोध तक नहीं रहता। फिर भी जागने पर हम कहते हैं—
“मैं सोया था।”
अर्थात अवस्थाएँ बदलती हैं, अनुभव बदलते हैं, शरीर बदलता है—लेकिन चेतना का आधार बना रहता है।
यही चेतन सत्ता जीवात्मा है।
और यहीं से आध्यात्मिक जीवन की शुरुआत होती है।
जब तक मनुष्य केवल शरीर को “मैं” मानता रहेगा, तब तक उसकी सारी चिंताएँ शरीर के इर्द-गिर्द घूमती रहेंगी—मेरा रूप, मेरा धन, मेरा सम्मान, मेरा परिवार, मेरा पद, मेरी सफलता, मेरी असफलता।
लेकिन जिस दिन उसे यह बोध होने लगता है कि—
“मैं यह शरीर नहीं, इस शरीर में रहने वाला जीव हूँ,”
उस दिन जीवन को देखने का पूरा दृष्टिकोण बदलने लगता है।
वह समझता है कि शरीर साधन है, साध्य नहीं।
शरीर की देखभाल करनी है, लेकिन शरीर को ही जीवन का अंतिम सत्य नहीं मानना है।
शरीर को स्वस्थ रखना है, लेकिन आत्मा को भूखा नहीं रखना है।
धन कमाना है, परिवार निभाना है, समाज में अपना कर्तव्य करना है—लेकिन यह भूलकर नहीं कि यह सब एक बदलते हुए शरीर के माध्यम से प्राप्त अवसर हैं।
और अंततः वह प्रश्न उठता है—
जब शरीर बदलते-बदलते वृद्ध हो गया, तब भी जो भीतर से “मैं” कह रहा है, वह कौन है?
यही प्रश्न मनुष्य को बाहर से भीतर की ओर ले जाता है।
यही प्रश्न उसे शरीर से आत्मा की ओर ले जाता है।
और जब यह समझ धीरे-धीरे दृढ़ होने लगती है कि “मैं शरीर का स्वामी हूँ, शरीर स्वयं मैं नहीं हूँ,” तब मृत्यु का भय भी अपना स्वरूप बदलने लगता है।
मृत्यु तब जीवन का पूर्ण विराम नहीं दिखाई देती।
वह केवल एक शरीर से दूसरे शरीर की यात्रा का एक पड़ाव दिखाई देने लगती है।
इसलिए आध्यात्मिक ज्ञान हमें मृत्यु से भागना नहीं सिखाता।
वह हमें मृत्यु से पहले अपने वास्तविक स्वरूप को पहचानना सिखाता है।
क्योंकि जिसने जीवन में ही यह जान लिया कि—
“मैं शरीर नहीं हूँ, मैं शरीर में रहने वाली चेतन आत्मा हूँ,”
उसके लिए मृत्यु कोई अज्ञात अंधकार नहीं रह जाती।
वह समझने लगता है—
शरीर आया, बदला और चला जाएगा;
लेकिन मैं वह हूँ जो इन सभी परिवर्तनों का साक्षी बना रहा।
शरीर की उम्र बढ़ती है,
आत्मा की उम्र नहीं बढ़ती।
शरीर जन्म लेता है,
जीवात्मा शाश्वत है।
शरीर मरता है,
जीवात्मा की यात्रा समाप्त नहीं होती।
और शायद जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न यही नहीं है कि “मेरी उम्र कितनी हो गई?”
बल्कि यह है—
“जिसे मैं ‘मैं’ कहता हूँ, उसे मैंने अब तक कितना पहचाना?”
दासानुदास चेदीराज दास
