जन्म-जन्मांतरों की परतों का रेचन…
मनुष्य के भीतर केवल इस जन्म के अनुभव और संस्कार ही जमा नहीं होते। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो जन्म-जन्मांतरों से संचित संस्कार, इच्छाएं, आसक्तियां और प्रवृत्तियां भी जीव के सूक्ष्म अस्तित्व के साथ चलती रहती हैं। यही कारण है कि कई बार मनुष्य बिना किसी स्पष्ट कारण के किसी विशेष इच्छा, भय, क्रोध, मोह या आकर्षण से बंधा हुआ दिखाई देता है।
श्रुति और स्मृति में संचित ये संस्कार समय के साथ परत-दर-परत जमा होते जाते हैं। इन परतों में तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण अपने-अपने प्रभाव छोड़ते रहते हैं। कभी अज्ञान और आलस्य हमें नीचे खींचते हैं, कभी इच्छाएं और उपलब्धियों की दौड़ हमें संसार में और उलझाती है और कभी सतोगुण हमें ज्ञान, शांति और सदाचार की ओर ले जाता है।
लेकिन जब मनुष्य सच्चे अर्थों में आध्यात्मिक साधना की ओर बढ़ता है, कृष्ण का स्मरण करता है, नाम-जप करता है और अपने भीतर झांकना शुरू करता है, तब एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया प्रारम्भ होती है—
जन्म-जन्मांतरों से जमा इन संस्कारों का रेचन शुरू होने लगता है।
यह रेचन हमेशा सुखद अनुभव के रूप में नहीं आता। कभी साधना में मन अधिक भटकता है, कभी पुराने विचार सामने आते हैं, कभी दबे हुए अहंकार और इच्छाएं दिखाई देने लगती हैं। मनुष्य सोच सकता है—
“मैं तो भगवान की ओर बढ़ रहा हूं, फिर मेरे भीतर यह सब क्यों उठ रहा है?”
क्योंकि अब वह भीतर छिपी उन परतों को देख पा रहा है, जो पहले अचेतन रूप से उसके जीवन को संचालित कर रही थीं।
जिस प्रकार किसी पुराने घाव की सफाई करते समय पहले पीड़ा दिखाई देती है और फिर धीरे-धीरे घाव भरने लगता है, उसी प्रकार आध्यात्मिक साधना में भी भीतर का मैल सामने आ सकता है।
साधना हमेशा मन को तुरंत शांत नहीं करती; कई बार वह पहले मन की अशांति का परिचय कराती है।
यही वह समय है जब साधक को घबराना नहीं चाहिए। उसे अपने भीतर उठ रहे संस्कारों से लड़ने के बजाय उन्हें कृष्ण के चरणों में अर्पित करना चाहिए।
श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं—
“यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्॥”
मन जहां-जहां भटके, उसे बार-बार वापस लाना है।
यही निरंतर अभ्यास धीरे-धीरे जन्म-जन्मांतरों से चली आ रही उन प्रवृत्तियों की पकड़ को कमजोर करता है।
फिर एक समय आता है जब मनुष्य समझने लगता है कि मैं अपने संस्कार नहीं हूं, मैं अपने विचार नहीं हूं, मैं अपनी इच्छाएं नहीं हूं। ये सब प्रकृति की परतें हैं, जो आत्मा को ढके हुए हैं।
आत्मा तो कृष्ण की शाश्वत अंश है।
इसलिए आध्यात्मिक यात्रा का अर्थ केवल कुछ नया प्राप्त करना नहीं है। यह तो जन्म-जन्मांतरों से अपने ऊपर चढ़ी परतों को हटाने की यात्रा भी है।
एक-एक परत हटती है।
मोह थोड़ा कम होता है।
अहंकार थोड़ा पिघलता है।
इच्छाओं की पकड़ थोड़ी ढीली होती है।
मन थोड़ा निर्मल होता है।
और अंततः साधक के भीतर से एक आवाज आती है—
“जिसे मैं बाहर खोज रहा था, वह तो मेरे भीतर पहले से विराजमान था।”
कृष्ण को पाने के लिए कहीं दूर जाने की आवश्यकता नहीं; आवश्यकता है उन परतों को हटाने की, जिन्होंने हमें अपने वास्तविक स्वरूप से दूर कर दिया है।
जन्म-जन्मांतरों का संचित संस्कार कितना भी गहरा क्यों न हो, कृष्ण-नाम की साधना से भीतर का रेचन प्रारम्भ हो सकता है।
बस साधना में निरंतरता चाहिए, धैर्य चाहिए और सबसे बढ़कर—कृष्ण पर विश्वास चाहिए।
क्योंकि आत्मसाक्षात्कार की यात्रा में हम भगवान को नया नहीं बनाते;
हम केवल अपने भीतर से वह सब हटाते जाते हैं, जो हमें भगवान को देखने से रोक रहा है।
दासानुदास चेदीराज दास
