श्राद्ध मास की पूर्णमासी से पितृपक्ष शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। यह 16 दिन श्राद्ध के रूप में अपने पितरों के सम्मान, धर्म कर्म तथा दान के दिनों के रूप में मनाए जाते हैं। श्राद्ध का आश्रय श्रद्धा पूर्वक किया गया सत्कर्म है। जिससे पितरों की आत्मा को शांति और उनको याद कर उनके प्रति कृतज्ञता जाहिर करना इसका उद्देश्य है। धार्मिक ग्रंथो में वर्णित है कि पितृ दोष होने पर व्यक्ति को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए पितृपक्ष में पितरों का पूजन कर स्मरण किया जाना चाहिए। इसके पीछे मान्यता है कि जिन पूर्वजो के कारण हम इस दुनिया में आए हैं जिनसे गुण तथा शरीर मिला है, उनको याद कर हम उनके नाम से कुछ पुण्य कर्म कर लें।और अच्छे कर्म के साथ उन्हें याद कर ले। श्रद्धा सच्चा विश्वास और प्रेम से किए जाने वाला कर्मकांड है। यह उनके प्रति सम्मान और स्मरण भाव को व्यक्त करने का तरीका है। इन दिनों में पितरों की याद कर दान करना उनके नाम पर धार्मिक अनुष्ठान पूजा पाठ आज किया जाता है। पितृ पक्ष में श्रद्धालु मन वचन और कर्म से संयम का जीवन जीते हैं। अपने पितरों को याद कर निर्धन और ब्राह्मण को भोजन और दान आदि करते हैं। विष्णु पुराण के अनुसार गाय की सेवा से भी पितृ दोष दूर होते हैं और यह भी शुभ कार्य बहुत ही फलदायक होता है।
भगवानदास शर्मा ‘प्रशांत’
शिक्षक सह साहित्यकार
इटावा उत्तर प्रदेश
संपर्क सूत्र:70 17777083
Email: prashantunorg@gmail.com
