आज की
खाली कुर्सी.
दीपावली की सफ़ाई चल रही थी. घर के एक कोने में एक पुरानी कुर्सी को देखकर बेटी ने कहा-“ माँ, ये कुर्सी बहुत पुरानी और टूटी-फ़ूटी है, क्यों न हम इसे कबाड़ में फ़ेंक दें.?.
माँ ने इसे ऐसा करने से मना कर दिया.
बेटी ने जानना चाहा कि इस टूटी-फ़ूटी कुर्सी में ऐसी कौन-सी खास बात है, जिसे माँ ने फ़ेंकने से मना कर दिया. उसने पूछा-“ ऐसा क्या है इस कुर्सी में.?”
माँ ने उसे समझाते हुए कहा-“ तुम नहीं जानती, इसी कुर्सी में तुम्हारे नानाजी हर शाम बैठकर हमारा,.. सबका इंतजार किया करते थे. भले ही आज यह कुर्सी खाली पड़ी है,लेकिन मुझे लगता है कि यह आज भी भरी हुई ही है.”
कुछ चीजें घर की नहीं, रिश्तों की निशानी होती है. यह बात उसकी समझ में आ चुकी थी.
बेटी ने कुर्सी को साफ़ दिया. उस पर नया कपड़ा बिछाते हुए बोली-“ माँ, …अब यह कुर्सी इसी जगह पर रहेगी.”
माँ की आँखें नम हो गईं
