समय कम है या ज्यादा, यह तुम्हारे हाथ में नहीं; लेकिन उस समय का उपयोग कैसे करना है, यह तुम्हारे हाथ में है।
मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही है कि वह समय को अपना समझ लेता है। वह कहता है—“अभी बहुत समय है, यह काम बाद में कर लेंगे।” लेकिन जीवन कभी यह वचन नहीं देता कि वह ‘बाद में’ अवश्य आएगा।
हम भविष्य के लिए धन बचाते हैं, घर बनाते हैं, बच्चों के लिए योजनाएँ बनाते हैं, लेकिन यह भूल जाते हैं कि जिस भविष्य के लिए इतना कुछ जोड़ रहे हैं, उसमें हमारी उपस्थिति ही निश्चित नहीं है।
आध्यात्मिक दृष्टि से समय परमात्मा की दी हुई अमानत है। हमें यह अधिकार नहीं मिला कि हम तय करें कि कितनी सांसें मिलेंगी; हमें केवल यह अवसर मिला है कि मिली हुई सांसों को किस कर्म में लगाएँ।
एक ही दिन किसी के लिए व्यर्थ बीत सकता है और उसी दिन कोई व्यक्ति किसी भूखे को भोजन देकर, किसी निराश व्यक्ति को सहारा देकर, किसी दुखी को सांत्वना देकर अपने जीवन को सार्थक कर सकता है।
घड़ी दोनों के लिए समान समय दिखाती है, लेकिन कर्म उस समय का मूल्य तय करते हैं।
इसलिए जीवन का प्रश्न यह नहीं है कि हमारे पास कितना समय बचा है। असली प्रश्न यह है—
जो समय बचा है, उसमें हम क्या बचाना चाहते हैं—धन या संबंध? अहंकार या आत्मा? शिकायतें या प्रेम?
कल के भरोसे टाला हुआ प्रेम कभी-कभी जीवनभर का पछतावा बन जाता है। टाली हुई क्षमा मन में बोझ बन जाती है और टली हुई भक्ति शायद फिर अवसर ही न पाए।
इसलिए जो अच्छा करना है, आज करिए।
जिसे गले लगाना है, आज लगाइए।
जिससे क्षमा मांगनी है, आज मांगिए।
जिसकी सहायता करनी है, आज कीजिए।
और परमात्मा को जिस क्षण याद किया जा सकता है, उसे किसी दूसरे दिन के लिए मत बचाइए।
समय हमारा नहीं है, लेकिन समय का सदुपयोग हमारा धर्म है।
क्योंकि अंत में जीवन हमसे यह नहीं पूछेगा कि—
“तुम्हें कितनी सांसें मिली थीं?”
वह पूछेगा—
“जो सांसें मिली थीं, उनमें तुमने कितना जीवन जिया?”
प्रसंग -2
तो तुरंत बोलने से पहले एक क्षण रुकिए…?
अपने मन से पूछिए—
“क्या मैं इस व्यक्ति को सुधारना चाहता हूँ या स्वयं को श्रेष्ठ साबित करना चाहता हूँ?”
यह एक प्रश्न हमारी बहुत-सी निंदा रोक सकता है।
और यदि वास्तव में सामने वाले को सुधारना जरूरी हो, तो पहले अपने भीतर प्रार्थना कीजिए—
“हे कृष्ण! मेरी वाणी में कठोरता नहीं, करुणा हो।
मेरे शब्दों में अहंकार नहीं, सुधार की भावना हो।
और सबसे पहले मुझे मेरे अपने दोष दिखाई दें।”
क्योंकि जीवन बहुत छोटा है।
दूसरों के दोष गिनते-गिनते यदि जीवन निकल गया तो अंत में हमारे पास दूसरों की गलतियों की पूरी सूची होगी, लेकिन अपने जीवन को सुधारने का समय नहीं होगा।
इसलिए आज से एक छोटा-सा संकल्प करें—
दूसरे की गलती दिखे तो पहले स्वयं को देखें।
दूसरे को सुधारने से पहले अपनी प्रतिक्रिया सुधारें।
दूसरे का दोष दिखे तो कृष्ण से अपने दोष दूर करने की प्रार्थना करें।
क्योंकि अंततः भगवान के सामने हमें यह प्रमाण नहीं देना है कि—
“प्रभु, मैंने कितने लोगों की गलतियाँ पकड़ीं।”
हमें यह देखना है कि—
“प्रभु, आपकी कृपा से मैंने अपने भी कितनी गलतियाँ पहचानीं और कितनी छोड़ने का प्रयास किया।”
शायद इसी को साधना कहते हैं।
दूसरों पर उंगली उठाना बंद नहीं,
बल्कि उंगली उठाने से पहले अपने भीतर झाँकना सीखना है।
तीन उंगलियां हमारी ओर हैं—
शायद वे हमें दोषी ठहराने के लिए नहीं,
हमें स्वयं से मिलाने के लिए उठी हैं।
शुभ रात्रि
दासानुदास चेदीराज दास
दासानुदास चेदीराज दास
